पुरुषार्थ

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पुरुषार्थ मनुष्य के कइसन कर्म करे के चाहीं एह बात के भारतीय परंपरा में निर्धारण हवे। एक तरह से ई जीवन जिये के लक्ष्य बतावे ला। परंपरागत रूप से चारि गो पुरुषार्थ गिनावल गइल बाड़ें - धर्म (नैतिक लक्ष्य), अर्थ (धन-संपत्ति के अर्जन), काम (सुख, प्रेम आ भावनात्मक संतुष्टी) आ मोक्ष (आध्यत्मिक ज्ञान आ मुक्ति)। सुरुआती तीनों के आचरण में प्राप्ति सभके लक्ष्य बतावल बाटे जबकि मोक्ष मनुष्य के अन्तिम लक्ष्य हवे, जहाँ संसार के आवागमन चक्र से मुक्ति के पावे खातिर, आध्यात्मिक ज्ञान के प्राप्ति के तरीका मानल जाला।

पुरुषार्थ के हिंदू परम्परा में केन्द्रीय स्थान मानल जाला आ हिंदू धर्म के माने वाला लोग एकरा के आश्रम व्यवस्था आ वर्ण व्यवस्था के साथ हिंदू परंपरा के मुख्य आधार के रूप में भी देखे लें।

इहो देखल जाय[संपादन करीं]

संदर्भ[संपादन करीं]