शैव मत

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शैव मत, शैव पंथ भा शैव संप्रदाय हिंदू धर्म के एगो प्रमुख शाखा हवे। एह मत के माने वाला लोग शिव के सभसे बड़ देवता या फिर साक्षात ब्रह्म के स्वरुप माने ला। एह मत के माने वाला लोग के शैव कहल जाला। हिंदू धर्म के बाकी परंपरा सभ नियर, शैव परंपरा के भी कई शाखा-उपशाखा मौजूद बाड़ी जेह में शैव सिद्धांत रुपी द्वैतवादी धार्मिक बिचार से ले के योग से परभावित एकात्मवादी परंपरा ले मौजूद बा। एह संप्रदाय के परभाव क्षेत्र भी पूरा भारत में बिस्तार लिहले बा आ काश्मीर से ले के सुदूर दक्खिन भारत ले एह मत के चलन बाटे। शैव मत के माने वाला लोग वेदआगम ग्रंथ सभ के धर्मशास्त्र के प्रमुख स्रोत के रूप में अंकार करे ला।

शैव मत के मूल, दुसरी सदी ईसा पूर्ब के आसपास के समय के प्राचीन वैदिक परंपरा में देखल जाले, जहाँ रुद्र रुपी वैदिक देवता के पूजा के वर्णन मिले ला। प्राचीन ग्रंथ श्वेताश्वेतरउपनिषद में, जेकर काल पहिली सहस्राब्दी ईसा पूर्व मानल जाला, रुद्र, शिव आ माहेश्वर के जिकिर मिले ला। हालाँकि, एह ग्रंथ के शैव मत के ग्रंथ माने में बिबाद बाटे। ईसा के बाद के सुरुआती दौर में पाशुपत शैव मत के चलन साफ तौर पर देखे के मिले ला आ ई पहिला शैव मत हवे जेकरे अलग परंपरा के रूप में स्थापित होखे के परमान मिले ला। भक्तिवादी आ एकात्मवादी शैव मत सभ के चलन पहिलिये सहस्राब्दी ईसवी से चलनसार भ गइल रहे आ बाद में कई बेर कई हिंदू राजघराना सभ के धर्म के रूप में अस्थान पवलस। एकरे बाद एह मत के चलन दक्खिन-पूर्ब एशिया ले चहुँपल आ बौद्ध धरम के साथे-साथ एह मत के चलन भी इंडोनेशिया, वियतनामकंबोडिया नियर देसन में बिकसित भइल आ एह देसन में हजारन गो शिव मंदिर अस्थापित कइल गइलें। वर्तमान जुग में शैव संप्रदाय हिंदू धर्म क एक ठो प्रमुख भाग बाटे।

शैव संप्रदाय के माने वाला लोग के अनुसार शिव एह सृष्टि के रचयिता, पालनहार आ बिनासक हवें; या फिर खुद आत्मन हवें जे हर जीव में बास करे ला; या फिर ब्रह्म के स्वरुप हवें। एह मत के शाक्त मत से भी काफी जुड़ाव हवे आ बहुत सारा शैव लोग सम्मिलित रूप से शिव-शक्ति के पूजा आराधना करे ला। मूल हिंदू परंपरा नियर, ई शाखा भी संत-साधू के जीवन बितावे, योग के महत्व देवे आ अपना भीतर मौजूद शिव के तलाश करे के शिक्षा देला आ ई हिंदू धर्म के सभसे बड़हन समुदाय सभ में से एक के रूप में भी स्थापित बाटे।

संदर्भ[संपादन]