सिरफल

श्रीफल चाहे सिरफल चाहे बेल (संस्कृत में बिल्व) एगो गरम जलवायु क फल हवे। ई पूरा भारत में होला आ खासकर मैदानी हिस्सा में बहुत मिलेला। एकर पतई, जेवना के बेलपत्र कहल जाला शंकर भगवान के चढ़ेला। फल क गूदा निकाल के शरबत बनावल जाला जवन तासीर में ठंढा होला आ पेट खातिर बहुत फायदेमंद मानल जाला।
कल्चर में
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बेल (संस्कृत में “बिल्व”) हिंदू धर्म में बहुत पवित्र पेड़ मानल जाला , आ एहसे एकर इस्तेमाल धार्मिक क्रियाकलाप (पूजा-पाठ) में कइल जाला। सबसे पुरान प्रमाण ऋग्वेद के श्री सूक्त में मिलेला, जहाँ एह पौधा के देवी लक्ष्मी (धन आ समृद्धि के देवी) के निवास अस्थान मानल गइल बा। बेल के पेड़ के देवी सती के अवतार भी मानल जाला। ई पेड़ आमतौर पर हिंदू मंदिरन आ घर के बगइचा में देखे के मिलेला। अइसन मान्यता बा कि शिवजी के बेल बहुत प्रिय हवें, एतना कि उनकर एगो नाम “बिल्वदंड” (बेल के दंड धारण करे वाला) भी पड़ गइल हवे। आजो बेल के पत्ता (बेलपत्र) आ फल शिव पूजा में बहुत महत्व वाला चीज हवे। बेल के पत्ता के तीन पत्ती वाला रूप (त्रिपत्र) शिव के त्रिशूल के प्रतीक मानल जाला, आ एगो अउरी मान्यता के अनुसार ई शिव के तीन ठे आँख के भी निशानी हवे।
नेपाल के नेवार समुदाय में हिंदू आ बौद्ध परंपरा के अनुसार, बेल के पेड़ लड़की लोग के एगो खास संस्कार में इस्तेमाल होला, जवन बेल विवाह (बेल बियाह) कहल जाला। एहमें लड़की के बेल के फल से “बियाहल” जाला। मान्यता बा कि जब तक ई फल सुरक्षित रहेला आ ना फूटेला, तब तक लड़की कबहूँ विधवा ना होई—भले अगर ओकर असली पति के मृत्यु हो जाव। ई परंपरा नेवार समाज में विधवा औरतन के उच्च सामाजिक दर्जा देवे के तरीका मानल जाला।
बेल के फल बौद्ध ग्रंथन में भी मिलेला, खासकर दड्डभ जातक (जातक 322) में। एह कहानी में बुद्ध एगो कथा सुनावेलन, जहाँ एगो खरगोश बेल के फल गिरला के आवाज से डर जात बा—ई कहानी “हेनी पेनी” जइसन कथा के शुरुआती रूप मानल जाला।
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[संपादन करीं]संदर्भ
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