कजरी

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कजरी एक तरह क भोजपुरी लोकगीत हवे। ई सावन की महीना के गीत ह जेकरा के बिटिया-मेहरारू कुल झुलुआ खेलत समय गावेलीं। कजरी गा-गा के झुलुआ खेलला के "कजरी खेलल" कहल जाला। ई उत्तर प्रदेश[1]बिहार[2] के एगो प्रमुख लोक गीत ह। भोजपुरी के अलावा ई गीत मैथिली आ मगही में भी गावल जाला[3] हालाँकि, कजरी के मुख्य क्षेत्र भोजपुरी इलाका[4] आ एहू में बनारसमिर्जापुर के एकर मुख्य क्षेत्र मानल जाला।[5]

कुछ बिद्वान लोग कजरी के उत्पत्ति बनारस मिर्जापुर के इलाका में होखे वाली शक्ति पूजा भा गौरी पूजा से जोड़े ला जबकि कुछ वैष्णव लोग एकरा के कृष्ण के पूजा आ लावनी से जोड़े ला; मिर्जापुर के परंपरागत लोक कलाकार लोग एकरा के बिंध्यवासिनी देवी के देन माने ला।[5]

परिचय[संपादन]

भोजपुरी क्षेत्र में अलग-अलग मौसम में गावल जाये वाला तरह-तरह क गीत पावल जालें जेवना में कजरी क आपन एगो अलगे महत्व हवे । कजरी गावे क मौसम बरसात क होला जब सावन की महीना में ए गीतिन के गावल जाला। कजरी के गीति गावे वाली अधिकतर नयी उमर के लइकी-बिटिया होखेलीं । ए गीतिन के सावन में झुलुआ खेलत घरी लइकी कुल आपस में दू गोल बना के गावेलीं। कजरी गा-गा के झुलुआ खेलला के "कजरी खेलल" कहल जाला । एहीसे कजरी की गीतिन में सावन की महीना क हरियाली, रिमझिम बरखा के फुहार क खनक, खेल-खेलवाड़ के चंचलता, किशोरावस्था के उछाह अउरी आपस में छेड़छाड़ वाली बातचीत के सरसता झलकेला।

बिसय[संपादन]

कइसे खेले जाइबि सावन में कजरिया
बदरिया घेरि आइल ननदी ।।
तू त चललू अकेली, केहू सँगे ना सहेली;
गुंडा घेरि लीहें तोहरी डगरिया ।।
बदरिया घेरि आइल ननदी ।।
केतने जना खइहें गोली, केतने जइहें फँसिया डोरी;
केतने जना पीसिहें जेहल में चकरिया ।।
बदरिया घेरि आइल ननदी ।।

--परंपरागत

सावन की मौसम आ गावे वालिन के उमिर के हिसाब से कजरी की गीतिन में बिबिध बिसय मिले ला। गीतन में अधिकतर चंचलता आ प्रेम भरल विषय मिलेला। पति-पत्नी के प्रेम संबाद आ बिरह बरणन,[6] ननद-भउजाई क छेड़छाड़, सासु-पतोहि क नोकझोंक, राधा-कृष्ण क प्रेम, श्रीरामचंद्र के जीवन क घटना, अउरी नई बहुरिया क अपने पति की साथै प्रेम भरल बातचीत कजरी क सबसे चलनसार विषय हवें। कजरी गावे वालिन में बहुत लइकी अइसनो होखेलीं जवन बियाह-गौना की बाद पहिला सावन में अपनी नइहर आइल रहेलिन जेकरा वजह से वियोग-रस से भरल कजरी क गीति भी मिलेलीं। एकरी अलावा जीवन के हर बात से जुडल कजरी क गीति छिटपुट पावल जालीं । भारत की आजादी के लड़ाई के समय देशभक्ती वाली कजरी बहुत गावल जाँय जिनहन के "सुराजी कजरी" कहले जाला।

इहाँ कजरी क एगो उदहारण दिहल जात (साइड में कोटेशन देखीं) बा जवना में ननद-भउजाई क संवाद बा:

पहिले भउजाई ननद से कहत बाड़ी कि "ए ननद! इ तऽ बादर घेरि आइल बा, हम एइसना में सावन में कजरी खेले कइसे जाइबि?" ननद कहत बाड़ी – "ए भउजी तू त अकेलही कजरी खेले जात बाडू आ तोहरी संघे केहू सहेलियो नइखे। डहरी में तोहके गुंडा रोकि लिहें तब!" ए पर भउजाई जवाब देत बाड़ी – "कि अगर एइसन होई त केतने लोग गोली खाई, केतने फाँसी पर चढ़ी आ केतने लोगन के जेल में चक्की पीसे के पड़ी।"

एकरे अलावा खेती-किसानी से ले के बिबिध अन्य बिसय के बरनन कजरी के गीतन में मिले ला। दयानिधि मिसिर के कहनाम बा:

(कजरी में)... बारिश के इतने रंग-रूप, चित्र-प्रयोजन, मूड-भाव सँजोये हैं भोजपुरी साहित्य ने कि इस वैविध्य के सामने कोई भी साहित्य रश्क करे।

— दयानिधि मिश्र, लोक और शास्त्र: अन्वय और समन्वय, [7]

तिहुआर[संपादन]

गीत के बिधा के अलावा कजरी नाँव के तिहुआर भी मनावल जाला। ई तिहुआर भोजपुरी इलाका आ बुंदेलखंड में मामूली हेरफेर के साथ मनावल जाला। सावन के पुर्नवासी के सावनी के साथ-साथ कजरी पूर्णिमा भी कहल जाला। भोजपुरी क्षेत्र में ई तिहुआर जेठ के पहिला अतवार, जेकरा परावन पूजा कहल जाला, से सुरू हो के भादों के अँजोरिया के दुआदसी, बावनी दुआदसी तक ले चले ला।[8] एह दौरान बनारस आ मिर्जापुर में दुगोल्ला कजरी के आयोजन भी होला। "कजरी नउमी" आ "कजरी पूर्णिमा" के एह तिहुआर के बुंदेलखंड के लोक-जीवन में खास महत्व हवे; सावन के अँजोरिया के नउमी के कजरी बोअल जाला, जेह में मेहरारू बाहर से माटी ले आ के घर के अन्हार कोना में रख के ओम्मे जौ बोवे लीं, पुर्नवासी के एही जई के ले के कजरी के जलूस निकरे ला।[8]

कलाकार[संपादन]

मिर्जापुर के कबी आ लोक कलाकार बदरीनारायण 'प्रेमधन' के नाँव कजरी के जिकिर में जरूर लिहल जाला।(शांति जैना 1992, p. 97) गायक कलाकारन में भोजपुरी-मैथिली इलाका के मशहूर गायिका शारदा सिन्हा के गावल कई गो कजरी परसिद्ध बाड़ी।

फुटनोट[संपादन]

संदर्भ[संपादन]