मौर्य साम्राज्य

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भारत के नक्सा पर मौर्य साम्राज्य के बिस्तार
अपना सभसे चरम काल में मौर्य साम्राज्य के बिस्तार

मौर्य साम्राज्य प्राचीन काल के लोहा जुग में, लगभग 322 ईसा पूर्व से 187 ईसा पूर्व के दौर में, भारतीय उपमहादीप में एक ठो बिसाल राज रहल। एकर संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य रहलें आ अशोक के समय में ई अपना चरम बिस्तार पर पहुँचल। अपना चरम काल में ई एह भूगोलीय क्षेत्र में अब तक ले भइल सभसे ढेर बिस्तार वाला राज्य हवे।

भारतीय मैदानी इलाका के वर्तमान बिहार राज्य में, ओह जमाना में मगध राजघराना के स्थापना से सुरू भइल ई साम्राज्य के राजधानी पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) रहल।

इतिहास[संपादन]

चाणक्य आ चंद्रगुप्त[संपादन]

पूरबी भारत में, चउथी सदी ईसा पूर्व में नंद बंस के शासन रहल। कहानी कहल जाला कि राजा घनानंद भरल सभा में विष्णुगुप्त चाणक्य के अपमान क दिहलें जेकरा से नराज हो के चाणक्य परतिज्ञा क लिहलें की नंद बंस के बिनास क दिहें।[1] एही चाणक्य के मदद से चंद्रगुप्त द्वारा मौर्य राज के स्थापना तक्षशिला में भइल जे बाद में बिसाल साम्राज्य के रूप में स्थापित भइल।

एह समय से ठीक पहिले, बिजेता सिकंदर के सेना ब्यास नदी के पूरुब बढ़े से मना क दिहले रहल आ सिकंदर बेबीलोन लवट गइल रहलें। सिकंदर के मौत के बाद उनके राज के अधीन पच्छिमी भारत के हिस्सा पर यूनानी लोग कंट्रोल पोढ़ ना रहि गइल[2] सिकंदर के मौत के पाँचे बरिस के बाद पुरु (पोरस) के भुला दिहल गइल।[3] एकरा बाद चंद्रगुप्त मेसीडोनियाई लोग के हरा के आपन राज पंजाव में स्थापित कइलेन[3], चाणक्य के मदद से मजबूत सेना बनवलें आ एकरे बाद मगध पर आक्रमण क के उहाँ के सम्राट बनलें। हालाँकि, चंद्रगुप्त के शक्ति के उदय के बारे में बहुत बिबाद बाटे आ इतिहासकार लोग बहुत सारा बात पर एकमत ना बा लोग।

मगध बिजय[संपादन]

चाणक्य बिद्वान आ कुशल नीति निर्माता रहलें, कूटनीति के ज्ञाता रहलें, रणनीति बनावे आ गुप्तचर ब्यवस्था करे में उनके महारथ रहल। ऊ चंद्रगुप्त के मंत्री के रूप में मगध के शत्रु लोग से मेल करे आ सहजोगी जुटावे के काम कइलें, मगध में आपन गुप्तचर भेजलें।

सभसे पहिले चाणक्य अपना एगो शिष्य आ तत्काल में पोरस के प्रतिनिधि राजा के रूप में कैकेय पर राज करे वाला मलायकेतु के साथे मिलवलें। विशाखदत्त के मुद्राराक्षसम् में आ जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्व सभ में चंद्रगुप्त के "पर्वतिक" राजा के साथ अलायंस बनावे के बिबरन मिले ला[2], जिनके पोरस के रूप में इतिहासकार लोग चिन्हित करे ला। एह हिमालयी एलायंस में यवन (यूनानी), कंबोज, शक (सीथीयाई), किरात (नेपाली), पारसीक (ईरानी), आ बाह्लीक (बैक्ट्रियाई) लोग[2] सामिल हो के एक साथ मगध पर हमला कइल आ राजधानी पाटलिपुत्र, जेकरा के कुसुमपुर[4] भी कहल जाय, बिजय स्थापित कइल।

चंद्रगुप्त[संपादन]

पाटलिपुत्र शीर्षक, यूनानी आ फारसी परभाव के सबूत, सुरुआती मौर्य काल, ४थी-३सरी सदी ईसा पूर्व।

मेसिडोनियाई लोग के खिलाफ चंद्रगुप्त तब आक्रमण कइलें जब सेल्यूकस I (निकेटर) द्वारा भारत के उत्तरपच्छिमी भाग सभ के, जिनहन के सिकंदर के समय में जीतल गइल रहे, दोबारा जीते के कोसिस कइल गइल लगभग 305 ईसा पूर्व में। एह लड़ाई के बारे में यूनानी इतिहासकार लोग कुछ नइखे लिखले[2] मानल जाला कि एह लड़ाई में सेल्यूकस के भागे के पड़ल, बाद में चंद्रगुप्त आ सेल्यूकस के बीच समझौता भइल जेह में एक ठो औपचारिक जुद्ध-संधि लिखल गइल। एकरे अनुसार, यूनानी लोग आपन राजकुमारी के बियाह चंद्रगुप्त से कइल। चंद्रगुप्त द्वारा कंबोज, गांधार, कंधाहार, आ बलूचिस्तान के इलाका पर काबिज हो गइलेन आ बदला में सेल्यूकस के 500 हाथी मिललें[2] जे उनके पच्छिमी सीमा पर जारी हेलेनिस्टिक जुद्ध सभ के बहुत मददगार साबित भइलेन। दुनों राज के बीच में राजदूत के रूप में भी संपर्क बढ़ल आ मेगस्थनीज नियर इतिहासकार लोग के मौर्य दरबार में स्थान मिलल।

बिंदुसार[संपादन]

मौर्य साम्राज्य के पहिला शासक, चंद्रगुप्त मौर्य आ उनके पत्नी दुर्धरा के बेटा बिंदुसार (298 - 272 ईसा पूर्व) , उनके बाद राजा बनलें। ओह समय बिंदुसार के उमिर मात्र 22 बरिस रहल। बिंदुसार के बारे में ओतना ऐतिहासिक जानकारी ना मौजूद बा जेतना उनके पिता चंद्रगुप्त भा उनके बेटा अशोक के बारे में मिले ला, तबो कुछ जानकारी इनहूँ के राजकाज के बारे में जरूर मौजूद बा।

यूनानी इतिहासकार लोग इनके "अमित्रचेत्स" के नाँव से बोलवले बा, जेकर संस्कृत रूप "अमित्रघात" होखे के अनुमान लगावल जाला।[5] मध्यकालीन तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ के लिखित बौद्ध धर्म के इतिहास में ई बिबरन मिले ला कि बिंदुसार ओह समय के सोरह गो राजा लोग के दमन कइलेन आ साम्राज्य के बिस्तार पच्छिमी समुंद्र से ले के पूरबी समुंद्र ले कइलें।[6] कुछ लोग एकरा के दक्कन बिजय माने ला, काहें कि उनहन लोग के अनुसार पूरबी समुंद्र (बंगाल के कुछ इलाका छोड़ के) से ले के पच्छिमी समुंद्र (सौराष्ट्र के अलावा) पहिलहीं, चंद्रगुप्त के काल में, मौर्य साम्राज्य के हिस्सा बन चुकल रहल। कुछ इतिहासकार लोग एकरा के नया बिजय ना माने ला बलुक बिद्रोह के दमन भर माने ला।[6] अशोक के शिलालेख-13 के हवाले से ई बतावल जाला कि मैसूर ले के इलाका अशोक के पैतृक राज के रूप में मिलल रहल।[7] एही कारन ई बितर्क कइल जाला कि दक्षिण के बिजय या टेम्पलेट चंद्रगुप्त के काल में भइल या बिंदुसार के समय में।[8]

दिव्यावदान नाँव के ग्रंथ से तक्षशिला में बिद्रोह के बिबरन मिले ला जेकरा के रोके खातिर बिंदुसार अशोक के भेजलें। अशोक के पहुँचे पर पता चलल कि उहाँ के लोग ना त राजकुमार के बिरुद्ध बा न राजा बिंदुसार के बाकिर दुष्ट आमात्य (मंत्री) लोग उनहन लो के अपमान करे ला।[6][9]

बिंदुसार पच्छिम के यूनानी शासक लोग से दोस्ती के संबंध रखलें। स्ट्रेबो के हवाला से ई बतावल जाला कि ग्रीक शासक एंटियोकस, जे सेल्यूकस के उत्तराधिकारी रहलें, बिंदुसार के दरबार में डायमेकस नाँव के दूत भेजलें।[6] प्लिनी के हवाला से बतावल जाला कि फिलाडेल्फस द्वारा एगो दूत डायोनीसस के भेजल गइल रहे।[8]

पुराण सभ के मोताबिक बिंदुसार 24 साल राज कइलें, जबकि महावंश के अनुसार 27 साल, इतिहासकार राधाकुमुद मुखर्जी के हवाला दे के बिंदुसार के निधन के तिथि 272 ईसा पूर्व बतावल जाला।[10] बिंदुसार के बाद इनके बेटा अशोक उत्तराधिकारी बनलें जे बिंदुसार के जीवन में उज्जयिनी के शासन ब्यवस्था के देखरेख करें।

फुटनोट[संपादन]

संदर्भ स्रोत[संपादन]