भोजपुरी संस्कृति

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भोजपुरी संस्कृति के ही भोजपुरिया संस्कृति भी कहल जाला| भोजपुरी के अन्य भाषा से संबंध के बारे में कहल जाला -

मैथिल के बहिन लागे अवधी के भाई |

अंगरेजी के बाप लगे संस्कृत के माई||

प्रकृति के जन्मल बेटी पिए गंगा के पानी |

सहज सुशील बिनम्र दुअर्थी एह भाषा के पहिचानि||

भोजपुरी संस्कृति के इतिहास

भोजपुरी संस्कृति के इतिहास अशोक महान से भी पुरान ह अशोक महान के पूरा नाम देवानांप्रिय अशोक मौर्य रहे उनकर राजकाल ईसापूर्व 273 से 232 तक रहे प्राचीन भारत में मौर्य राजवंश के चक्रवर्ती राजा रहले उनका समय में मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दुकुश के श्रेणि से ले के दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण आ मैसूर पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अफ़गानिस्तान तक पहुँच गईल रहे । एह समय के उ बहुत प्रतापी राजा रहन। बिहार के प्राचीन नाम ’विहार’ रहे , जिसका मतलब मठ होला । यी भारत के पूर्वी भाग में स्थित बा क्षेत्रफल के हिसाब से बिहार भारत का बारहवां सबसे बड़ा और आबादी के मान से तीसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य ह। बंगाल के क्षेत्र में पहुंचने से पहले गंगा नदी एहि राज्य से बहेली जेकरा कारन यी राज्य वनस्पति आ जीव-जन्तु से समृद्ध बा। बिहार के वन क्षेत्र भी विशाल बा जवन कि 6,764 वर्ग किमी के बा यी राज्य भाषाई तौर पर प्रभावकारी बा एहिजा कई भाषा बाडिस जवना में भोजपुरी प्रधान भाषा मानल जाला, बिहार की राजधानी पटना ह, जेकर नाम पहले पाटलीपुत्र रहे । भारत के कुछ महान राजा जैसे समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त मौर्य, विेक्रमादित्य और अशोक के शासन में बिहार शक्ति, संस्कृति और शिक्षा क केन्द्र बन गईल रहे यह समय दुगो महान शिक्षा केन्द्र रहन , विक्रमशिला और नालंदा विश्वविद्यालय। बिहार में आज भी 3,500 साल पुरान इतिहास के गवाही देत कई प्राचीन स्मारक मौजूद बाड़िस

अन्य संस्कृति से भिन्नता

भोजपुरी संस्कृति के अन्य संस्कृति से भिन्न पवित्र आ मानवता के नजदीक होखे के कुछ प्राकृतिक अउर दैविक कारन भी बा संस्कृत भाषा के एक रचना जवना के उत्तरी संस्करण में सिंहासनद्वात्रिंशति तथा "विक्रमचरित के नाम से दक्षिणी संस्करण में उपलब्ध बा एकर संस्कर्ता एक मुनि जी रहन जिनकर नाम क्षेभेन्द्र रहे बंगाल में वररुचि जी के द्वारा प्रस्तुत संस्करण भी एहि के समरुप मानल जाला एकर दक्षिणी रुप ज्यादा लोकप्रिय भइल लोक भाषा में एकर अनुवाद होते रहे अउर पौराणिक कथा नियन भारतीय समाज में मौखिक परम्परा के रुप में रच-बस गइलस यी कथा के रचना "वेतालपञ्चविंशति" या "बेताल पच्चीसी" के बाद भइल लेकिन निश्चित रुप से रचनाकाल के बारे में कुछ नईखे कहल जा सकत। एतना लगभग तय बा कि एकर रचना धारा के राजा भोज के समय में ना भइल होई काहेकि प्रत्येक कथा में राजा भोज के उल्लेख मिलेला यह से एकर रचना काल 11वीं शताब्दी के बाद भइल होई । एकरा के द्वात्रींशत्पुत्तलिका के नाम से भी जानल जाला ।

लोक कथा

एह कथा के भूमिका में भी कथा बा जवन राजा भोज की कथा कहेलिस 32 कथा 32 पुतलि के मुह से कहल बा जवन एक सिंहासन में लागल बाडीस। यी सिंहासन राजा भोज के विचित्र परिस्थिति में मिलल। एक दिन राजा भोज के मालूम भइल कि एक साधारण चरवाहा अपना न्यायप्रियता खाती मसहूर बा , जबकि उ बिल्कुल अनपढ़ बा तथा पुश्तैनी रुप से उनके राज्य के कुम्हार के गायी, भैंस बकरि चरावेला । जब राजा भोज तहक़ीक़ात करवले त पता चला कि उ चरवाहा सब फैसला एगो छोट पहाड़ पर चढ़ के करेला राजा भोज के जिज्ञासा बढ़ गईल तब उ भेष बदल के वोह चरवाहा के पास गईले ओकरा के कठिन समस्या के समाधान करत देख राजा दंग रह गईले वो चरवाहा के नाम चन्द्रभान रहे। राजा के पुछला पर चन्द्रभान एक दिब्य शक्ति के बारे में राजा के बतवलस की उ शक्ति एहि टीला पर हमरा आवेली आ हमरा के उचित न्याय करे में मदत करेली। जब राजा वोह जगह के खोदवावले तब उनका एक सिंघासन मिलल। राजा पंडित लोग के बोला के सिंघासन पर बैठे के मुहूर्त निकलवले आ जब मुहूर्त के दिन सिंघासन पर बैठे चलले तब सिंघासन में लागल सोना के बत्तीस पुतरी ठठा के हंस देली स। जब राजा पुतरी से हँसे के कारन पुछले तब पुतरी कहे लगलि स ये राजन यी सिंघासन त राजा बिक्रमादित्य के ह एकरा प तू तबे बईठीह जब तू राजा बिक्रमादित्य नियन होइह तब राजा पुछले की राजा बिक्रमादित्य में का खासियत रहे एह सवाल के जबाब में बिक्रमादित्य के बत्तीस गो पुतली 32 गो काथा सुनवलिस एहि 32 कथा के आधार पर राजा भोज के एगो सभ्य संस्कृति के ज्ञान भइल जेकरा के उ भोजपुरी संस्कृति के नाम से परम प्रतापी राजा बिकमादित्य के दिब्य अंश के रूप में लोक कल्याण खाती छोड़ गईल बाड़े राजा बिक्रमादित्य के समय से ही काल गड़ना चलल जेकरा के विक्रम सम्बत कहल जाला हिन्दू आर्य के संस्कृति भी ईहे ह जवन आज भी भोजपुरी संस्कृति के नाम से जानल जाले