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बाबा धाम

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बाबा बैद्यनाथ मंदिर
Group of temples with pyramid shaped Shikhara
मुख्य मंदिर आ आसपास के छोट मंदिर सभ
बाबा धाम के लोकेशन Jharkhand में
बाबा धाम
झारखंड में लोकेशन
बेसिक जानकारी
अक्षांस-देशांतर24°29′33″N 86°42′00″E / 24.49250°N 86.70000°E / 24.49250; 86.70000निर्देशांक: 24°29′33″N 86°42′00″E / 24.49250°N 86.70000°E / 24.49250; 86.70000
देवताबाबा बैद्यनाथ (शिव)
तिहुआरशिवरात, श्रावणी मेला (सावन)
Districtदेवघर
राज्यझारखंड
देसभारत
वेबसाइटwww.babadham.org
Creatorराजा पूरनमल (कथा अनुसार - विश्वकर्मा)
बिसेस लच्छन
मंदिर सभ22
ऊँचाई22[1] मी (72 फीट)

बाबा बैद्यनाथ धाम, जे बैजनाथ धाम भा बाबा धाम[2] के नाम से मशहूर बा, भारतीय राज्य झारखंड के संथाल परगना मंडल में देवघर में एगो हिंदू मंदिर बाटे।[3]भगवान शिवजी के मंदिर हवे आ पुराणिक बिबरन अनुसार बारह गो ज्योतिर्लिंग सभ में एकर गिनती होला। बाबा धाम के नाँव से परसिद्ध एह मंदिर मंडली में मुख्य मंदिर बाबा बैजनाथ के बा आ एकरे अलावा अउरी एकइस गो मंदिर बाने जेवना में देवी के शक्तिपीठो (ह्रदयपीठ) सामिल बाटे।[2]

हिंदू कथा सभ के मोताबिक रावण शंकर जी के खुस करे खातिर आ बरदान पावे खातिर लमहर तपस्या के बाद आपन दसो मूँड़ी काटि के चढ़ा दिहलें जेकरा बाद शंकर जी प्रगट भइलें आ खुस हो के उनके वापिस जिया दिहलें। शिव जी एगो बैद के रूप में रावण के मूँड़ी जोड़लें, एही कारन उनके एह रूप के बैद्यनाथ कहल जाला।

हर साल सावन के महीना में इहाँ सावनी मेला लागे ला आ काँवरिया लोग गंगा जी से जल ले के पैदल जतरा क के इहाँ आ के मंदिर में जल चढ़ावे ला।

किंबदंती

[संपादन करीं]

किंवदंती के अनुसार रावण भगवान शिव के बड़हन भक्त रहलन। ऊ शिवजी के प्रसन्न करे खातिर हिमालय क्षेत्र में कठोर तपस्या करत रहलें। ऊ अपना नौ गो मूँड़ी भगवान शिव के अर्पित कर चुकल रहलें। जब ऊ दसवाँ मूँड़ी चढ़ावे वाला रहलें, तब शिव प्रकट भइलें आ उनकर भक्ति से प्रसन्न हो गइलें। शिव रावण से पूछलें कि ऊ का वरदान चाहेला। रावण कामना लिंग के लंका ले जाए के इच्छा जतवलें आ कहलें कि ऊ भगवान शिव के कैलाश से लंका ले जाए चाहत बाड़ें। शिव रावण के ई वरदान देवे खातिर राजी हो गइलें, बाकिर एगो शर्त रखलें। ऊ कहलें कि अगर यात्रा के दौरान कहीं भी लिंग के धरती पर रख दिहल गइल, त ऊ ओही जगह हमेशा खातिर स्थापित हो जाई आ फेर ओकरा के हटावल ना जा सकी।

जब देवता लोग के ई पता चलल कि शिव कैलाश छोड़के लंका जाए वाला बाड़ें, त ऊ लोग चिंतित हो गइल। तब सभे देवता विष्णु से सहायता माँगलें। विष्णु वरुण देव, जे जल के देवता मानल जालें, से कहलें कि ऊ आचमन (हथेली में जल लेके पिए के धार्मिक क्रिया) के माध्यम से रावण के पेट में प्रवेश कर जास। एह कारण रावण जब कामना लिंग लेके लंका जात रहलें, तब देवघर के आसपास उनकरा लघुशंका करे के बड़ी तेज हाजत महसूस भइल। कथा के अनुसार, एह समय विष्णु बैजू भील नाम के एगो चरवाहा के रूप धारण कइलें। रावण जब सूर्य नमस्कार करे गइलें, त ऊ कामना लिंग के कुछ देर खातिर बैजू के देखभाल में दे दिहलें। वरुण देव के प्रभाव से रावण के लौटे में बहुत देर हो गइल। बैजू बहुत देर तक इंतजार करत-करत नाराज हो गइल आ आखिरकार ऊ लिंग के जमीन पर रखके ओहिजा से चल गइल।

जब रावण वापस अइलें, त ऊ कामना लिंग के उठावे के बहुत कोशिश कइलें, बाकिर सफल ना हो सकलें। तब उनकरा बुझाइल कि ई सभ भगवान विष्णु के लीला बा। क्रोध में आके रावण अपना अंगूठा से लिंग पर जोर लगवलें, जवना से शिवलिंग के कुछ हिस्सा जमीन के भीतर धँसि गइल। बाद में ब्रह्मा, विष्णु आ दूसर देवता लोग ओह शिवलिंग के पूजा कइलें आ ओहिजा बैद्यनाथ मंदिर के निर्माण करवलें। ओही समय से मानल जाला कि महादेव कामना लिंग के रूप में देवघर में बिराजमान बाड़ें।

ज्योतिर्लिंग

[संपादन करीं]

शिव महापुराण के अनुसार, एगो बेर ब्रह्मा (सृष्टि के रचयिता) आ विष्णु (सृष्टि के पालनकर्ता) के बीच एह बात पर विवाद हो गइल कि दुनु में केकरा के श्रेष्ठ मानल जाए। दुनु के परीक्षा लेवे खातिर भगवान शिव तीनों लोक के भेदत एगो विशाल, अनंत आ प्रकाशमान स्तंभ के रूप में प्रकट भइलें, जेकरा के ज्योतिर्लिंग कहल गइल। एह अनंत ज्योति के आदि-आ अंत खोजे खातिर विष्णु नीचे के ओर चल गइलें, जबकि ब्रह्मा ऊपर के ओर गइलें। बहुत खोजला के बाद भी विष्णु के ज्योति के अंत ना मिलल, त ऊ अपना हार मान लिहलें। बाकिर ब्रह्मा झूठ बोल दिहलें कि ऊ ज्योति के छोर खोज लिहले बाड़ें। एह पर शिव दोसर प्रकाश-स्तंभ के रूप में प्रकट भइलें आ ब्रह्मा के सराप दिहलें कि उनकर पूजा सामान्य धार्मिक अनुष्ठानन में ना होई, जबकि विष्णु के युग-युगांतर तक पूजा कइल जाई। ज्योतिर्लिंग शिव के ओह सर्वोच्च, अखंड आ अनंत स्वरूप के प्रतीक मानल जाला, जहाँ से शिव अपना स्वरूप के प्रकट कइलें। एह कारण ज्योतिर्लिंग मंदिर ऊ पवित्र स्थान मानल जालें जहाँ शिव अग्निमय प्रकाश-स्तंभ के रूप में प्रकट भइल रहलें।

परंपरा के अनुसार शुरू में 64 गो ज्योतिर्लिंग मानल जात रहलें, बाकिर एह में से 12 गो ज्योतिर्लिंग सबसे पवित्र आ शुभ मानल जालें। हर ज्योतिर्लिंग स्थल पर शिव के अलग-अलग रूप के पूजा होला। एह सभे मंदिरन में मुख्य रूप से शिवलिंग स्थापित बा, जे बिना आदि आ बिना अंत वाला स्तंभ के चीन्हा भा निशानी ह आ शिव के अनंत स्वरूप के दर्शावेला।

मत्स्य पुराण में एह स्थान के आरोग्य बैद्यनाथतीर्थ कहल गइल बा। पुरान समय में देवघर के ई पूरा इलाका गिद्धौर के राजा लोग के शासन में रहे। गिद्धौर के राजा लोग के बैद्यनाथ मंदिर से गहिर आस्था रहे। 1266 ईस्वी में राजा बीर विक्रम सिंह एह रियासत के स्थापना कइलें। 1757 में पलासी के लड़ाई के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी लोग एह मंदिर पर ध्यान देवे लागल। मंदिर के व्यवस्था देखे खातिर कीटिंग नाँव के एगो अंग्रेज अधिकारी के भेजल गइल। बीरभूम के पहिलका अंग्रेज कलेक्टर मिस्टर कीटिंग मंदिर के प्रबंधन में खास रुचि लिहलें।

1788 में मिस्टर कीटिंग के आदेश पर उनकर सहायक मिस्टर हेसिलरिग—जिनका के संभवतः देवघर आवे वाला पहिलका अंग्रेज मानल जाला—तीर्थयात्री लोग से मिलल चढ़ावा आ शुल्क के वसूली के खुद निगरानी करे खातिर बाबाधाम अइलें। बाद में जब मिस्टर कीटिंग खुद बाबाधाम घूमे अइलें, त ऊ एह मंदिर के धार्मिक परंपरा आ महत्व से प्रभावित भइलें। एह चलते ऊ मंदिर के कामकाज में सीधे दखल देवे के नीति छोड़ दिहलें आ मंदिर के पूरा प्रबंधन फेर से मुख्य पुजारी के जिम्मे सौंप दिहलें।

बाबाधाम में स्थित हवन कुंड मंदिर साल में खाली एगो बेर खुलल जाला। एह मंदिर से जुड़ल एगो खास परंपरा नवरात्र के पर्व के दौरान होखे ला।

एकरे संघे एगो अउरी बिचित्र परंपरा जुड़ल बाटे जे ब्रिटिश काल से चलत चल आ रहल बा। देवघर के सेंट्रल जेल के कैदी लोग महीना भर नियम-बरत के साथ रोज बाबा के चढ़ावे खातिर फूलन के मुकुट बनावे लें आ ई ले आ के मंदिर में बाबा के चढ़ावल जाला।[2]

काँवर जात्रा

[संपादन करीं]

सावन के महीना में भक्त लोग एगो खास किसिम के परंपरा में काँवर पर गंगाजल ले के आवे ला आ बाबा बैद्यनाथ के ओह जल से अभिषेक करे ला। ई जात्रा कुल करीबन 105 किलोमीटर के होखे ले जे पैदल कइल जाला।[2] ई काँवर जात्रा बिहार के भागलपुर जिला में सुल्तानगंज से शुरू होखे ले जहँवा गंगाजी उत्तर मुँहे बहे ली। एहिजे बाबा अजगैबीनाथ के मंदिर बाटे। एही उत्तरवाहिनी गंगा से लोग जल भरे ला आ काँवर में जल ले के एहिजा से पैदल बाबा धाम खातिर चले ला। एह जात्रा में काँवर ढोवे के तरीका आ लागे वाला समय के हिसाब से कई रूप मिले लें। जे लोग चउबीस घंटा भर के समय में ई जात्रा पूरा करे खातिर पैदल दउरत चले ला ओह लोगन के "डाक बम" के नाँव से जानल जाला। एकरा अलावे "दांडी बम" आ "खड़ी काँवर"[2] औरो दूसर रूप हवें।

  1. "Baba Baidyanath Dham". Incredible India. Retrieved 2025-04-27.
  2. 1 2 3 4 5 "द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है देवघर का बाबा बैद्यनाथ धाम, जहां साथ". डीडी न्यूज़ (Hindi में). 5 August 2026. Retrieved 5 August 2026.
  3. "Baba Baidyanath Temple Complex". Archived from the original on 2015-06-27. Retrieved 2010-04-05.