पहिनावा

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एगो हिन्दू, एगो लंका के आ एगो बर्मा के आदमी के पहिनावा

पहिनावा केहू आदमी भा औरत द्वारा पहिनल जाए वाला सगरी चीज के कहल जाला जेवन आम तौर पर सूत से बनल कपड़ा की रूप में होला। एकर मुख्य उद्देश्य शरीर के ढांकल आ मौसम से बचाव होला। पहिनावा में कपड़ा के परकार, मात्रा आ इस्टाइल कई बात पर निर्भर बाटे जइसे कि मौसम, फैशन आ देस-अस्थान।

पहिनावा, कपड़ा पहिने की तरीका के आ कपड़ा सभ से रूप रंग आ परकार के भी कहल जाला। आम तौर पर पहिनावा से मतलब होला कि केहू कइसन कपड़ा पहिरले बाटे। ब्यापक अरथ में ई कौनों अस्थान, क्षेत्र या देस के के लोगन के कपड़ा आ कपड़ा पहिरे की तरीका के बतावेला। समय कई अनुसार पहिनावा में भी बदलाव होला। ई बदलाव एकही आदमी कई उमिर में बदलाव से भी हो सकेला आ बहुत लम्बा समय में कौनों बिसेस जगह कई लोगन के पुरा पहिनावा में भी बदलाव हो सके ला। पुरान समय में पहिनावा कुछ अउरी रहे आज ओही अस्थान के लोग दूसर किसिम के पहिनावा पहिन सके ला।

इहो देखल जाय[संपादन]

संदर्भ[संपादन]

बाहरी कड़ी[संपादन]