प्रयोगकर्ता:Drpremlatatripathi

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आधार छन्द - गीतिका मापनी 2122 2122 2122 212 समान्त-अहना,पदांत - चाहिए

गीतिका ---- 1

गंध केसर का धरा पर स्रोत बहना चाहिए । गूँज वंदेमातरम् का मंत्र रहना चाहिए ।

रक्त की हर बूँद देती है नमी जैसे हमें, छंद वंदेमातरम् ही तंत्र गहना चाहिए ।

प्राण जीवन आस हर पल देश हित होता जहाँ । कंठ वंदेमातरम् का मान कहना चाहिए ।

हिंद का नारा यही है मान है अपना यही, जीत वंदेमातरम् कह प्राण दहना चाहिए ।

प्रेम चोला यह वसंती जीत है इसमें सदा, जोश वंदेमातरम् प्रतिरोध ढहना चाहिए ।

           डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

गीतिका -----2

आधार छंद- लावणी (मापनीमुक्त मात्रिक) विधान- 30 मात्रा, 16,14 पर यति, अंत में वाचिक गा समांत - अर,पदांत - देखे हैं।

स्नेह सिक्त भावों से भीगे,तन-मन अंतर देखें हैं । माँ की कृपा सिंधु से उभरे,मुक्ता अक्षर देखें हैं ।

वाणी को जो तीर बनाते,धार बहुत इनमें होती, घायल करते कृत्य कथन से,चुभते नश्तर देखे हैं ।

खिले वाटिका फूल नहीं अब,लगता साँपों का डेरा उगे नहीं पश्चिम से ऐसे, कभी दिवाकर देखें हैं ।

हरित क्रांति से झूमें सरसों,अलसी निखरे खेत जहाँ, धन्य धान्य से पूर्ण धरा पर,हंँसते हलधर देखें हैं ।

क्षोभ व्याप्त अब गलियाँ सूनी,दुःखी समाज हैजीवन रक्त रक्त हाहाकार मचा, जीवन बदतर देखें हैं ।

कंपित रग-रग शीतलहर से,ठिठुरे हारे जन पथ पर, मृत्यु आवरण धुंध कहर से,घिरते अक्सर देखें हैं ।

प्रेम छलकतीं हैं आँखें क्या,मजबूरी बदले मौसम, चुप हम रहते ऐसे सूखे, हृदय समंदर देखें हैं ।

                 डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

गीत ----3

मिटी नहीं बाधाएंँ कुछ,उठतीं अब भी भारी हैं । विघ्न बढ़ातींअभिलाषा,घनी आपदा जारी है

नहीं मानता मन अब भी,विघ्न नहीं परिवारों में, वर्चस्व पुरुष का अब भी,एकाकी अधिकारों में, अबला कहते नारी को,दंभ भरे कुविचारी है । विघ्न बढ़ातीं अभिलाषा,घनी आपदा जारी है ।

रोती अस्मिता आज भी,राह तके दुश्वारी जो, घोल रहा विष जीवन में,बढ़ती यह बीमारी जो, खेल बड़ा जो खेल रहे,उनकी दुनियादारी है । विघ्न बढ़ातीं अभिलाषा,घनी आपदा जारी है ।

विवश हुआ विश्वास यहाँ,झूठ सत्य पर बोझ घना, छीन रहा वह खुशियों को,कुष्ठ गात संगीन बना, बढ़ा रहे अपराधों को, कैसी यह लाचारी है । विघ्न बढ़ातीं अभिलाषा,घनी आपदा जारी है ।

वृद्ध युवा संतति समाज,मस्ती उनकी अलग थलग, मान पान सम्मान कहाँ,हस्ती ऊँची नीति विलग , वृद्धाश्रम में मात पिता,प्रेम जगत अब खारी है । विघ्न बढ़ातीं अभिलाषा,घनी आपदा जारी है ।

वर्ष गये अतीत बनकर,रीति कुरीति निभाते सब, विघ्न खड़ी है तनकर जो,भूल नहीं हम पाते सब, तीन तलाक बाधा मिटी,भाषण की बमबारी है । विघ्न बढ़ातीं अभिलाषा,घनी आपदा जारी है ।

मिटी नहीं बाधाएंँ कुछ,उठतीं अब भी भारी हैं । विघ्न बढ़ातीं अभिलाषा,घनी आपदा जारी है

               डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी