नलिन विलोचन शर्मा
नलिन विलोचन शर्मा | |
|---|---|
| जनम | 18 फरवरी 1916 पटना, बिहार आ उड़ीसा प्रांत, ब्रिटिश भारत |
| निधन | 12 सितंबर 1961 (उमिर 45) |
| पेशा | लेखक, प्रोफ़ेसर (हिंदी), समालोचक |
| राष्ट्रियता | भारतीय |
| नागरिकता | भारतीय |
| महतारी संस्था | पटना विश्वविद्यालय, पटना |
| साहित्यिक आंदोलन | नकेनवाद |
| प्रमुख रचना | Swarna Manjusha, Drishtikon, Sahitya ka Itihas Darshan, Maapdand (on literary criticism) etc. |
| महतारी-बाबूजी | राम अवतार शर्मा |
नलिन विलोचन शर्मा हिंदीभाषा के भारतीय लेखक रहलें।
सुरुआती जिनगी
[संपादन करीं]नलिन विलोचन शर्मा के जनम 18 फरवरी 1916 के पटना में भइल। ऊ आपन पिता रामअवतार शर्मा के चौथका अउलाद आ सबसे बड़ा बेटा रहलें। बचपने से नलिन के बाप उनकरा के संस्कृत के भारी-भारी रचना—अमरकोश, कालिदास के मेघदूत, आ सूर्यशतक नियन ग्रंथ—पढ़ावत रहलें। रामअवतार शर्मा के मान्यता रहे कि बच्चा के दिमाग में जेतना हो सके ज्ञान भर दिहल जाय; एहसे ऊ ज्ञान पूरा उमिर साथ देई। बस बड़ा भइला पर ओही ज्ञान के मनचाहा शब्द निकाल के, जब जेकरा चाही, ओहि तरह इस्तेमाल कर लेला।
नलिन विलोचन के बाप रामअवतार तबे गुजर गइलन जब नलिन बस बारह–तेरह बरिस के रहलें। ओकरा बाद उनकर सबसे नज़दीकी सहारा आ मार्गदर्शक उनकर सबसे बड़ा बहिन इंदुमती बनली।
कैरियर
[संपादन करीं]नलिन विलोचन शर्मा पटना विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यापक बनलन—ओही विभाग के, जेकरा स्थापना में उनकर बाप मदद कइले रहलें। नलिन खोजी स्वभाव वाला, तेज दिमाग के आ यूरोपीय साहित्य से खूब प्रभावित रहसें। 1950 के दशक में हिंदी जगत में छायावाद के जोर भइल, फेर प्रगतिवाद आइल, आ एही बीच नलिन आपन नया विचार 'नकेनवाद' लेके आइलन।
नलिन ई मानें कि कविता के असली सामग्री पुरान ग्रंथ ना, बलुक आपन आसपास के वर्तमान दुनिया से अउरी ज़्यादा मिलेला। उनकर माने में कविता के असल ताकत—शब्द के सटीकता, लय, संगीत, आ ध्वनि के खेल हवे; खाली विषयवस्तु ना। एह सोच पर अज्ञेय के तर सप्तक के गजब असर पड़ल रहे। नकेनवाद—नलिन, केसरी आ नरेश—एह तीन गो कवि के नाम से बनल। एह धारा में मानल गइल कि सही लयदार शब्द कविता में ओतना बल दे सकेला, जेतना विषय के ओढ़ावल सजावट ना दे सके।
नलिन कहें कि गद्य आ पद्य एक-दूसरा के पूरक हवें; दुनो में फर्क आर्टिफिशियल भर बा। ऊ रोजमर्रा के आसान भाषा के समर्थन करत रहलें, जइसे वर्ड्सवर्थ करत रहलें। ऊ कविता में ध्वन्यात्मक प्रयोग—जइसे “कलकत्ता पंजाब मेल”—के भी इस्तेमाल करत रहसें, जे उनकर शैली के अनोखा बनावे ले। नाटक में नलिन चैम्बर ड्रामा ले आइलन आ बिब्बो का बिब्बोक जइसन रचना से छाप छोड़लन। कहानी में ऊ मनोवैज्ञानिक यथार्थ के बारीकी से उतारलन—ओह समय में ई बात बिल्कुल नया रहे। ऊ कहत रहसें कि अच्छा कहानी लिखल “कृच्छ साधना”—तलवार के धार पर चलला जइसन—होखेला।
बाकिर नलिन के सबले बड़ा योगदान आलोचना में रहे। उनकर किताब मापदंड में फ्रांस–इंग्लैंड के आधुनिक आलोचना तरीका आ भारतीय परंपरा के सुंदर मेल मिलेला, जवन हिंदी साहित्य के बहुते समृद्ध कइलस। नलिन अपना विद्या पर बहुत भरोसा रखत रहस। एक बेर केहू साथी कहलस कि “महामहोपाध्याय” वाली परीक्षा दे दीं—नलिन हँसि के जबाब दिहलें, “हमार कापी के चेक करी?”
नलिन विलोचन शर्मा के निधन 12 सितंबर 1961 के भइल।
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