Jump to content

तारणपंथ

विकिपीडिया से
तारण पंथ
Founder
तारण स्वामी
Regions with significant populations
सेंट्रल भारत
20,000-100,000
Religions
दिगंबर जैन

तारणपंथ जैन धर्म के दिगंबर शाखा के एगो पंथ बा। एकर संस्थापक संत तारण स्वामी रहलन जे आज के बुंदेलखंड वाला इलाका में लगभग 1505 ईस्वी के आसपास के समय में एह पंथ के अस्थापना कइलन।[1] एह पंथ के माने वाला लोग के तारण पंथी कहल जाला।

तारण स्वामी

[संपादन करीं]

तारण स्वामी जैन धर्म के एगो धार्मिक गुरु आ एह तारण पंथ के संस्थापक रहलें। ऊ 15वीं सदी में मध्य भारत, आज्काल्ह के बुंदेलखंड के इलाका, में रहत रहलें। परंपरा अनुसार जवन जीवनी बतावल जाला, ओकरे अनुसार, ऊ दिगंबर जैन मत के रहस्यवादी परंपरा से जुड़ल रहलें। एकरा साथे उनकरा के धार्मिक अनुष्ठान में सुधार करे वाला गुरु भी मानल जाला। अइसन एह कारन से कि ऊ भट्टारक लोगन के धार्मिक अधिकार के स्वीकार ना कइलें आ मूर्ति पूजा के बजाय अनाकार उपासना आ आंतरिक आत्मबोध पर बेसी जोर दिहलें। तारण स्वामी के 14 गो ग्रंथ लिखे के श्रेय दिहल जाला।

निसाई जी मंदिर, ताराचंद मल्लुसाव के बनावावल, 1817

तारण स्वामी के निधन के बाद तारण पंथ के शुरुआती इतिहास बहुत साफ़ नइखे। नाम माला नाँव के एगो ग्रंथ में लगभग 2,000 लोगन के नाँव गिनावल गइल बाटे, बाकिर एह लिस्ट के असल महत्व अबहियों साफ़ नइखे। मौखिक परंपरा के हिसाब से, तारण स्वामी के चेला लोग अलग-अलग वर्ग आ जाति से रहलें। एहमें जैन आ गैर-जैन दुनो समुदाय के लोग शामिल रहल। कुछ चेला लोग त मुस्लिम पृष्ठभूमि से भी आइल रहल। लिखित स्रोतन के कमी के कारण अबले केहू विद्वान तारण पंथ के शुरुआती इतिहास के व्यवस्थित रूप से तैयार करे में सफल नइखे भइल। एह पंथ के धार्मिक संगठन के स्वरूप पूरा तरीका से किलियर नइखे। कुछ अनुयायी निसाईजी मंदिर से जुड़ल रहलें। एह पंथ में साधु-संन्यासी (मुनि) नइखन, हालाँकि कुछ ब्रह्मचारी आ ब्रह्मचारिणी गृहस्थ जीवन में रहके ब्रह्मचर्य के पालन करे लें।

आज तारण पंथ के अधिकांश अनुयायी बुंदेलखंड क्षेत्र के छह व्यापारी जातियन से आवे लें। एहमें से समैया, दोसाखे आ गुलालारे मूल रूप से मूर्तिपूजक जैन समुदाय से जुड़ल रहलें, जबकि असेठी, अयोध्यावासी आ चरनगर मूल रूप से वैष्णव हिंदू समुदाय से आइल रहलें। अलग-अलग अनुमान के अनुसार, तारण पंथ के अनुयायियन के संख्या लगभग 20,000 से 1,00,000 के बीच बा। 1989 में आर. समैया के अनुसार एह पंथ के 131 गो मंदिर रहल आ अनुयायियन के संख्या लगभग 20,000 रहे। आज अधिकांश अनुयायी मध्य प्रदेश में रहेलें, जबकि कुछ लोग दक्खिन उत्तर प्रदेश आ उत्तर-पच्छिम महाराष्ट्र में भी बसल बा।

  1. Smarika, Sarva Dharma Sammelan, 1974, Taran Taran Samaj, Jabalpur