इस्लामी सुलेख

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The phrase Bismillah in an 18th-century Islamic calligraphy from the Ottoman region and called Thuluth.

इस्लामी सुलेख, चाहें अरेबिक सुलेख, एगो ऐसन कला ह जवने में क़लम से हस्ताक्षर की द्वारा सुंदर रूप से सुलेख कइल जाला। इ खास तौर से अरबी अक्षरन के लिखे में उपयोगी बा, जवन की इस्लामी संस्कृती क अंग मनाला। अरबी भाषा में एके 'खत इस्लामी' मतलब 'इस्लामी लकीर' या फिर 'तामीर' कहल जाला।[1]

इस्लामी सुलेख का विकास बहुत दृढ़ता से कुरान से जुड़ल बा; कुरान क अध्याय और अंश एगो सामान्य और लगभग सार्वभौमिक पाठ ह जेपर इस्लामी सुलेख आधारित बा। कुरान की साथ गहरा धार्मिक सहयोग, साथे साथ मूर्तिकला कला की ऊपर संदेह की चलते इस्लामिक संस्कृतिन में कलात्मक अभिव्यक्ति खातिर सुलेख के ज्यादा महत्व मिलल। इ सुलेख कलाकृतिन की रूप में कई इमारतन पर जैसे, क़िला, मस्जिद, मदरसा, दर्गाह, क़ब्रस्तान वगैरह प देखल जा सकेला।

जैसन कि इस्लामी शिलालेख के अत्यधिक सम्मानित कइल जाला, अधिकांश कार्य धर्मनिरपेक्ष चाहें समकालीन कार्य की अपवाद की साथ-साथ अच्छी तरह से स्थापित सुलेखक द्वारा स्थापित उदाहरण क पालन करत लउके न स। पूर्वकाल में, एगो छात्र एगो गुरु की काम क प्रतिलिपि तबले करे जबले की ओकर हस्तलेख अपनी गुरु की समान न हो जा। सबसे सामान्य शैली कोणीय और प्रवाही शैली ह, ओकरी अलावा ए दुनुं में से हरेक के कईगो उप-शैलिन में विभाजित कइल जाला।

इस्लामी केलिग्राफ़र क पारंपरिक साधन क़लम ह, जवन आमतौर प सूखा रीड या फेर बांस से बनल होला; स्याही अक्सर कई रंग में होला, और एकर चुनाव ओकरी तीव्रता की अनुसार होला, ताकि रचना अनुसार विभिन्न प्रभाव दिहले की हिसाब से एकर इस्तेमाल करल जा सके। कुछ शैलिन में अक्सर एगो धातु की टिप वाला पेन क उपयोग क के लिखल जाला।

इस्लामी सुलेख पेपर की अलावा अन्य सजावटी माध्यम जैसे कि टाइल्स, जहाज, कालीन और शिलालेखन पर देखे के मिलेला।[2] कागज के आगमन से पहिले,  पेपाइरस और चर्मपत्र क उपयोग लेखन खातिर होखे। कागज क आगमन सुलेख में क्रांति ले आ दिहलस। यूरोप में कईगो मठ कई दर्जन एइसन संस्करणन क संग्रह कइले बान स, मुस्लिम दुनिया की पुस्तकालयन में नियमित रूप से एइसन सैकड़ों और यहां तक कि हजारों पुस्तक शामिल बा।

सुलेख खातिर सिक्का विशेष तौर प सुविधाजनक रहे। 692 की शुरुआत में, इस्लामी खलीफा नजदीकी पूर्व में सीक्कन पर दृश्य चित्रण के शब्दन से बदल दिह न। विशेष रूप से दिनार और उच्च मूल्य की सोना की सिक्कन पर इ बदलाव देखे के मिलल। आम तौर पर ए सिक्कन पर कुरान क उद्धरण चिह्न अंकित कइल गइल।

दसवीं शताब्दी ले, इस्लाम धर्म में परिवर्तित होखे वाला फारसी लोग बड़ा पैमाना प रेशमी कपड़न प एइसन शिलालेखन क बुनाई शुरू क देले रह न स। इ सुलेख वाला वस्त्र एतना कीमती रह न स की जेहादी एके बहुमूल्य उपहार की तौर प यूरोप ले गई न स।

कूफ़िक शैली[संपादन]

कूफ़िक शैली, अरबी क प्राचीन लिपी शैली ह। ए अक्षर लेखन में कोण बनवले क तरीका हमनी के प्राचीन नबाटियन अक्षरन क याद दिलावेला। ए कूफ़िक शैली में 17 अक्षर ऐसन बान स जेमें एराब (नुक्ता और छोटा स्वर) नाही हो न स। फेर ओमें नुक़्ता और छोटा स्वर लगावल जाला, जेकरी मदद से पाठक सही उच्चारण की साथ पढ सकेला लो। अरबी अक्षर बाद में 29 हो गई न स।[3] ए शैली क जन्म इराक़ की शहर कूफ़ा में भइल रहे।

संधर्भ[संपादन]

  1. Julia Kaestle (10 July 2010). "Arabic calligraphy as a typographic exercise".
  2. Chapman, Caroline (2012). Encyclopedia of Islamic Art and Architecture, ISBN 978-979-099-631-1
  3. "History of the Arabic Type Evolution from 1930 till Present".

बाहरी कड़ियाँ[संपादन]