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शिव तांडव स्तोत्र

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शिव तांडव स्तोत्र (संस्कृत: शिवताण्डवस्तोत्र, romanized: śiva-tāṇḍava-stotra) एगो संस्कृत धार्मिक स्तुति ह, जे हिंदू देवता शिव के समर्पित बा। शिव हिंदू धर्म के प्रमुख देवता लोग में से एक आ शैव धर्म में परमेश्वर मानल जालें। परंपरागत मान्यता के हिसाब से एकर रचना लंका के राजा रावण के कइल मानल जाला, जे शिव के परम भक्त मानल जालें।[1][2]

एह स्तोत्र के हर लाइन में 16 मात्रा बाड़ीं, जहाँ लघु (छोट मात्रा) आ गुरु (बड़ मात्रा) एक के बाद एक आवे लीं। संस्कृत छंदशास्त्र में ई पञ्चचामर छंद[नोट 1] कहाला आ पच्छिमी हिसाब से देखल जाय तब एकर छंदशास्त्रीय मीटर "आईऐम्बिक ऑक्टामीटर" (iambic octameter) ह। कुल मिलाके एह स्तोत्र में 17 चतुष्पदी (चार-चार लाइन के श्लोक) बाड़ें।

एह स्तोत्र के नउवाँ आ दसवाँ चतुष्पदी शिव के विनाशकारी रूप के नामावली पर खतम होला, जहाँ शिव के मृत्यु के विनाशकर्ता (कालांतक) तक के रूप में वर्णन कइल गइल बा। एह भक्ति काव्य में अनुप्रास (alliteration) आ ध्वन्यात्मकता (onomatopoeia) से गूँजत लयबद्ध सुंदरता उभर के सोझा आवेला।[3]

एकर अंतिम चतुष्पदी में, जब पृथ्वी पर तहलका मचावे से थक जालन, तब रावण पूछेलन, "कब हम सुखी होइब?"। एकर पीछे ऊ जोरदार तपस्या आ प्रार्थना के गहिराई रहल, जेकर उदाहरण ई स्तोत्र खुद ह। एह घोर तपस्या के कारणे, रावण के शिव से अपार शक्ति आ "चंद्रहास" नामक दिव्य खड्ग (तलवार) मिलल मानल जाला।[4][5][6]

जुड़ल कथा

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हिन्दू महाकाव्य रामायण के उत्तरकांड में वर्णन मिलेला कि दस सिर आ बीस भुजा वाला बलशाली राजा रावण आपन सौतेला भाई आ धन के देवता कुबेर के नगर अलकापुरी (जे कैलाश पर्वत के नजदीक स्थित बा) के जीत के लूट लिहलस। एह विजय के बाद, जब रावण पुष्पक विमान (जे ऊ कुबेर से चुरा लिहलस) से लंका लवटत रहल, त रास्ता में ओकर नजर एगो सुंदर जगह पर पड़ल। बाकिर आश्चर्यजनक रूप से ओकर विमान ओह जगह के पार ना कर सकल।

रावण ओहिजा शिव के गण नंदी (नंदीश, नंदिकेश्वर) से मिलल आ पूछलस कि ओकर रथ ओह जगह से आगे काहे ना जा रहल बा। नंदी बतवलें कि शिव आ पार्वती ओह पर्वत पर रतिक्रीड़ा में मग्न बाड़ें, आ ओहिजा से केहू के जाए के अनुमति नइखे। रावण एह बात के अनदेखी कइके शिव आ नंदी के उपहास उड़वलस।

आपन प्रभु के अपमान से क्रोधित होके नंदी रावण के श्राप दे दिहलें कि ओकर विनाश वानर (बंदरों) के हाथे होई। एहसे रावण आग-बबूला हो गइल आ नंदी के श्राप से आ आपन मार्ग रोकला से खिसिया के कैलाश पर्वत के उखाड़े के फैसला कइलस। ऊ आपन बीसों भुजा से कैलाश के उठा लिहलस, आ जइसे ही पर्वत हिलल, पार्वती भयभीत होके शिव के कस के पकड़ लिहली।

बाकिर सर्वज्ञ शिव तुरते समझ गइले कि ई उत्पात रावण के कारण भइल बा। शिव आपन बड़ पैर के अंगूठा से कैलाश के दबा दिहलें, आ रावण ओकरा नीचे फँस गइल। दर्द से कराहत रावण जोर-जोर से चिल्लाए लगल। ओकर मंत्रिन के सलाह पर ऊ हजार साल ले शिव के स्तुति में गान गावे लगल। आखिरकार, शिव ओकर भक्ति से प्रसन्न भइलें, ना खाली ओकरा के क्षमा कइलें, बल्कि ओकरा चंद्रहास नामक अजेय तलवार भी दिहलें।

काहे कि रावण एह समय जोर से गरज के रोअल रहल, एहसे ओकर नाम "रावण" पड़ गइल – मतलब "जे रोअल रहे"। जे श्लोक रावण गवलस, ऊ बाद में संग्रहित होके शिव तांडव स्तोत्र के रूप में प्रसिद्ध भइल।

इहो देखल जाय

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  1. जरौ जरौ जगाविदं वदन्ति पञ्चचामरं; मने की जगण रगण जगण रगण जगण गुरु चाहे आसान रूप में बतावल जाय त 121 212 121 212 121 2 मात्रा आवे लीं।
  1. Vālmīki; Menon, Ramesh (2004-05-26). The Ramayana: A Modern Retelling of the Great Indian Epic (अंग्रेजी में). Macmillan. ISBN 978-0-86547-695-0.
  2. Ayres, Elizabeth (2005). Know the Way: A Journey in Poetry and Prose (अंग्रेजी में). Infinity Publishing. p. 18. ISBN 9780741428257.
  3. Ramachander, P. R. "Shiva Thandava Stotram". saivism.net. Retrieved 25 July 2018.
  4. Bennett, James (7 June 2017). Beneath the Winds: Masterpieces of Southeast Asian Art from the Art Gallery of South Australia. Australia: Art Gallery of South Australia. p. 251. ISBN 978-1921668074.
  5. Cakrabartī, Bishṇupada (24 July 2008). The Penguin Companion to the Ramayana. Penguin. p. 91. ISBN 978-0143100461. Retrieved 24 July 2018.
  6. Social, Daily. "12 Of The Most Powerful Divine Weapons From Hindu Mythology". Daily Social. Archived from the original on 24 July 2018. Retrieved 24 July 2018.