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बह्र

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बह्र (अरबी بحر, lit.'समुंदर'; उर्दू: بحر;[1] अरबी, फ़ारसी, तुर्कीउर्दू शायरी में मीटर भा छंद के मतलब में इस्तेमाल होखे वाला शब्द हवे। शा'इरी में बह्र एक तरह के खास पैटर्न हवे, जवन 'अराकान' ('रुक्न' के बहुवचन — छंद के हिस्सन) के जोड़ से बनेला आ पूरा शे'र के “लंबाई” यानी मात्रा-विधान तय करे ला। उर्दू में बह्र आमतौर प तीन किसिम में बाँटल जाले—छोट बह्र, दरमियानी बह्र, आ लंबी बह्र—जवन शेर के कुल लंबाई पर आधारित होला।

ग़ज़ल में चूँकि हर शेर एके बह्र में होखे के चाहीं, एहसे अगर एक शेर (यहाँ तक कि एक लाइन) के बह्र पहचान लिहल गइल त पूरी ग़ज़ल के बह्र मालूम हो जाला। उदाहरण खातिर, मिर्ज़ा ग़ालिब के कई ग़ज़ल में हर शेर के मीटर आ लंबाई एके जइसन रखल मिलेला। यूरोपीय स्कैनशन तरीका में बह्र के पैटर्न एह तरह चिन्ह से लिखल जाला—“x” (लंबा या छोट), “u” (छोट), “-” (लंबा), “u u” (एक लंबा या दू छोट)—ताकि पूरी पंक्ति के लयात्मक ढांचा साफ देख सके:

x u – – u – u – u u
कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
आगे आती थी हाले-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती
जानता हूँ सवाब-ए-ता'अत-ओ-ज़ोह्द
पर तबीयत इधर नहीं आती
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती
काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुमको मगर नहीं आती

उपर लिखल ग़ज़ल मिर्ज़ा ग़ालिब के बा, आ ई बह्र: ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून महज़ूफ़ मक़्तू (मीटर G8) में लिखल गइल बा। ई दसभर अक्षर वाली बह्र हवे, एहसे उर्दू शायरी के मान से ई छोटी बह्र गिनल जाले। फ़ारसी छंद–विधान नियर, उर्दू में भी “overlong syllable” के नियम लागू होला — जइसे उम्मीद, बात (लंबा स्वर + व्यंजन) या शर्म (छोटा स्वर + दू व्यंजन), एह सबके एक लंबा + एक छोट मात्रा गिनल जाले। बाकिर उर्दू छंद में एक अहम फर्क बा: फ़ारसी के उलट, उर्दू में शब्द के आखिरी लंबा स्वर जरूरत पड़ला पर छोट मान लिहल जाला, ताकि बह्र पूरा बैठ सके — जइसे ऊपर आखिरी शेर में काबा शब्द में भइल बा (एकर उच्चारण काबॆ नियन होला, मने कि लघु स्वर ऎ)।

  1. "Rekhta Dictionary Meaning of Bahr".