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धर्मशास्त्र

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धर्मशास्त्र, संस्कृत के पुराणिक परंपरा में, कानून आ आचरण-बेह्वार से जुड़ल स्मृति ग्रंथ हवें। एह ग्रंथन में धर्म से जुड़ल नियमन आ बिचारन के बिस्तार से बतावल गइल बा। ई मूल रूप से शास्त्र भा धार्मिक-कानूनी ग्रंथ हवें। धर्मशास्त्र के ग्रंथ अक्सरहा बेहवारिक नियम से बेसी सैद्धांतिक ढंग से कानून आ आचरण के व्याख्या करे लें।

धर्मशास्त्रन के कुल गिनती के ले के अलग-अलग अंजाद लगावल गइल बा। अलग-अलग बिद्वान लोग इनहन के गिनती 18 से लेके 100 से बेसियो तक ले बतावेलें। हर धर्मशास्त्र के कई गो अलग-अलग रूप मिलेला। ई सभ ग्रंथ धर्मसूत्रन पर आधारित बाड़ें, जे ईसा पूर्व पहिलकी सहस्राब्दी में लिखल गइल रहलें। अइसन बतावल जाला की धर्मसूत्रन के विकास वैदिक काल में कल्प (वेदांग) के अध्ययन से भइल रहे।

धर्मशास्त्र के ग्रंथ आमतौर पर काव्य (श्लोक में) के रूप में लिखल गइल बाड़ें आ हिंदू धर्म के स्मृति ग्रंथन के हिस्सा हवें। इनहन में नीति-नियम, खास क'के अपना आ परिवार के प्रति कर्तव्य आ जिम्मेदारी, आ समाज के सदस्य के रूप में निभावे वाला जिम्मेदारी के बारे में अलग-अलग व्याख्या आ ग्रंथ मिलेला। एह ग्रंथन में आश्रम (जीवन के अलग-अलग चरण), वर्ण (सामाजिक वर्ग), पुरुषार्थ (जीवन के उचित लक्ष्य), व्यक्तिगत गुण आ कर्तव्य, आ सभ जीव-जंतु के प्रति अहिंसा जइसन बिसय सभ के चर्चा मिले ला। एकरा अलावा न्यायपूर्ण जुद्ध के नियम आ अउरी कई गो सामाजिक, नैतिक आ धार्मिक विषय पर भी चर्चा कइल गइल बा।

आधुनिक औपनिवेशिक भारत के इतिहास में धर्मशास्त्रनों के मजिगर प्रभाव रहल। शुरुआती ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी लोग एह ग्रंथन के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप में गैर-मुस्लिम लोग—हिंदू, जैन, बौद्ध आ सिख—खातिर कानून बनावे के कोशिश कइल। एह प्रक्रिया में धर्मशास्त्र के हिंदू कानून के आधार के रूप में इस्तेमाल कइल गइल।

आज के समय में सबसे बेसी परसिद्ध आ सबसे बेसी चर्चा में रहे वाला धर्मशास्त्र मनुस्मृति ह।