दक्षिणामूर्ति स्तोत्र
| दक्षिणामूर्ति स्तोत्र | |
|---|---|
| जानकारी | |
| धरम | हिंदू धर्म |
| लेखक | आदि शंकर |
| भाषा | संस्कृत |
| छंद | 10 |
दक्षिणामूर्ति स्तोत्र (संस्कृत: दक्षिणामूर्तिस्तोत्र, romanized: Dakṣiṇāmūrtistotra) एगो संस्कृत धार्मिक स्तोत्र ह, जे भगवान शिव के समर्पित बा आ जेकर रचनाकार आदि शंकराचार्य मानल जालें। ई स्तोत्र अद्वैत वेदांत परंपरा के संदर्भ में ब्रह्मांड के तत्वमीमांसा (मेटाफिजिक्स) के व्याख्या करेला।
बिबरन
[संपादन करीं]हिंदू पुराणन में, दक्षिणामूर्ति भगवान शिव के एगो रूप हवे, जे एह पुराणन के मोताबिक ज्ञान के सर्वोच्च देवता हउवें। ई रूप शिव के गुरु रूप में दर्शावेला, जहाँ उ हर तरह के ज्ञान के दाता हउवें। ई रूप शिव के परम जागरूकता, बोध आ ज्ञान के प्रतीक ह। एही रूप में शिव योग (आदियोगी – सभसे पहिला योगी), संगीत, आ बुद्धि के मूल स्रोत मानल जालें आ शास्त्रन के व्याख्या करे वाला रूप में देखल जालें।
जवना तरीका से अधिकांश हिंदू स्तोत्रन में भगवान के मानवीय रूप आ ओह लोग के दिव्य कार्यन के वर्णन रहेला, दक्षिणामूर्ति स्तोत्र ओहसे बहुते अलग किसिम के स्तोत्र ह। ई स्तोत्र अवधारणात्मक (कांसेप्चुअल) आ दार्शनिक रूप में रचल गइल बा। एहके श्लोक आत्मा के एकता के व्याख्या करेलन, जवन इंद्रियन के विविधता के बीच में मौजूद बा।
बाहरी कड़ी
[संपादन करीं]| ई हिंदू धर्म-संबंधी लेख एगो आधार बाटे। जानकारी जोड़ के एकरा के बढ़ावे में विकिपीडिया के मदद करीं। |