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ज्ञानपीठ पुरस्कार

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ज्ञानपीठ पुरस्कार भारत के सबसे पुरान आ सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान हवे, जे हर साल भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा अपन साहित्य में “उत्कृष्ट योगदान” खातिर कवनों लेखक के देहल जाला। ई पुरस्कार 1961 में शुरू भइल। ई पुरस्कार खाली ओही भारतीय लेखकन के मिलेला जे भारत के संविधान के आठवीं अनुसूची में दर्ज भारतीय भाषा आ अंग्रेजी में लिखेला। ई पुरस्कार निधन के बाद (posthumous) ना देहल जाला।

1965 से 1981 ले, ज्ञानपीठ पुरस्कार लेखक के “सबसे उत्कृष्ट कृति” खातिर देहल जाला। एहमें एगो प्रशस्ति–पत्र, नगद पुरस्कार आ सरस्वती (ज्ञान–बुद्धि के देवी) के कांसा के प्रतिमा होखे। सबसे पहिला ज्ञानपीठ 1965 में मलयालम लेखक जी. शंकर कुरुप के मिलल, उनकर कविता–संग्रह ओडक्कुझल (बँसुरी) खातिर, जे 1950 में प्रकाशित भइल रहे।

बाद में नियम बदलल, आ एही हिसाब से पुरस्कार देवे खातिर पिछला 20 साल में प्रकाशित रचनन के देखल जाए लगल (ओही साल छोड़ के, जे साल खातिर पुरस्कार देहल जा रहल होखो)। 1981 में पुरस्कार राशि बढ़ा के 1.5 लाख क दीहल गइल (2023 में ई रकम लगभग ₹31 लाख के बराबर हवे)। 2015 तक ई नगद पुरस्कार बढ़ा के 11 लाख कर दिहल गइल (2023 के मूल्य में करीब ₹17 लाख)। अब तक कुल 65 लेखक, जिनमें 8 महिला शामिल बाड़ी, ज्ञानपीठ पुरस्कार पा चुकल बाड़ें। 1976 में बांग्ला उपन्यासकार आशापूर्णा देवी ई सम्मान पावे वाली पहिली महिला बनली। ऊ 1965 के उपन्यास प्रथम प्रतिबद्धता (The First Promise) खातिर सम्मानित भइली, जे उनकर त्रयी (trilogy) के पहिली कड़ी हवे।

सबसे नया ज्ञानपीठ सम्मान (2024) हिंदी लेखक विनोद कुमार शुक्ल के दिहल गइल बा।