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गद्य

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गद्य (अंग्रेजी: prose; //ˈpɹəʊz// चाहे //ˈpɹoʊz// सुनल जाय) भाषा के ऊ रूप ह, जे बोलचाल के स्वाभाविक ढंग, सामान्य व्याकरणिक बनावट, चाहे लिखित भाषा के आम नियम आ रूपरेखा के पालन करेला। एह कारण गद्य के दायरा रोजमर्रा के चलतऊ बातचीत से लेके औपचारिक शैक्षणिक आ ऐकेडमिक लेखन तक फइलल बा। गद्य के सबसे बड़ अंतर पद्य (verse) से ई बा कि पद्य में जान-बूझ के कलात्मक बनावट अपनावल जाला। अलग-अलग भाषा में कविता के बनावट अलग हो सकेला। उदाहरन खाती, संस्कृत साहित्य में पद्य छंद में बन्हल काब्य होला; अंग्रेजी कविता में अक्सर रिदमिक मीटरराइम (तुक) के आधार पर भाषा के व्यवस्थित कइल जाला।

कवनो इलाका भा समुदाय के रोजमर्रा के बोलचाल के भाषा, आ भाषा के कई गो अउरी रूप आ शैली, गद्य के दायरा में आवेला। गद्य शब्द के इस्तेमाल बोलल आ लिखल, दुनो तरह के भाषा खातिर हो सकेला। लिखित रूप में गद्य के रूपरेखा पद्य से अलग होले। परंपरागत रूप से पद्य छंद (मीटर भा बह्र) में लिखल जाला, ठीक ओह तरह जेकरा से पद्य में रचल कविता के जोर से पढ़त घरी ओकर लय आ बनावट साफ सुनाई देला। उदाहरण खातिर, कई गो कविता में हर पंक्ति के आखिर में तुक होखेला, जवना से मय रचना बेसी मधुर आ इयाद रखे लायक बन जाले। एकरा उलट, गद्य में लिखाई के सामान्य नियम आ रूपरेखा अपनावल जाला। उदाहरण खातिर, उपन्यास में नया पात्र के संवाद शुरू होखे पर नया पैराग्राफ शुरू कइल जाला। हालाँकि, गद्य में पद्य नियर कवनो खास लय, छंद भा कलात्मक संरचना के पालन जरूरी ना होला।

शैक्षणिक आ ऐकेडमिक लेखन (जइसे दर्शनशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र आदि पर लिखल रचना), पत्रकारिता आ कथा-साहित्य के अधिकतर रचना गद्य में लिखल जाली, हालाँकि पद्य उपन्यास (प्रोज नॉवेल) जइसन कुछ अपवाद भी बाड़ें। 20वीं सदी के साहित्य में मुक्त छंद (फ्री वर्स), ठोस कविता (कंक्रीट पोएट्री) आ गद्य कविता (प्रोज पोएम) जइसन नया रूप सभ के सोझा अइला के बाद ई विचार मजबूत भइल कि कविता आ गद्य एक-दूसरा से पूरी तरह अलग ना होकर, एगो निरंतरता (स्पेक्ट्रम) के दू छोर बाड़ें। ब्रिटिश कवि टी. एस. इलियट के अनुसार, "पद्य (वर्स) आ गद्य के बीच के अंतर त साफ बा, बाकिर कविता (पोएट्री) आ गद्य के बीच के अंतर ओतना साफ नइखे।" संस्कृतो में काब्य के ब्यापक मानल गइल बाटे आ गद्य में लिखल काब्यात्म्क रचना के गद्यकाव्य के नाँव से बोलावल गइल बाटे।

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