कोहबर

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कोहबर (कौतुकगृह[1], कोष्ठवर[2]) उत्तरी-मध्य भारत, मने कि उत्तर प्रदेशबिहार के अवध, भोजपुरी क्षेत्र आ मिथिला क्षेत्र, अउरी एह से सटल नेपाल के तराई क्षेत्र (जनकपुर अंचल)[3] में चलनसार सांस्कृतिक चित्रकारी के एगो बिधा हऽ।[4][5]

बियाह के समय, घर के कवनो एगो कोठरी में पुरबी भीत प्रदेश पर गोबर से लीप के, पीसल हरदी (ऐपन) आ पिसल चाउर (चउरठ) से चित्रकारी कइल जाला; एकरे ठीक नीचे जमीन पर गोबर से लीप के बिबिध पूजन सामग्री रखल जालीं।[1] लइका आ लइकी दुनों के घर में, बियाह के रसम सभ में से एक कार्यक्रम कोहबर पुजाई होला जेहमें भीत पर बनल एह कोहबर के पूजल जाला। कोहबर पुजाई के समय गावल जाये वाला गीत कोहबर गीत कहालें[6] आ इनहन में दुलहा-दुलहिन के बीच परेम-भाव बढ़ावे के भाव होला।[7] कोहबर घर के ओह कोठरियो के कहल जाला जहाँ ई चित्र बनावल गइल होला। दुलहिन के बिदाई के बाद ससुरें आवे पर उतार के एही कोहबर में ले जाइल जाला।[7]

साहित्य में[संपादन]

अवध से ले के मिथिला ले के संस्कृति में कोहबर के महत्व के अनुमान तुलसीदास के रामचरितमानस में एकरे उल्लेख से लगावल जा सके ला। बालकाण्ड में राम सीता के बियाह के प्रसंग में तुलसीदास, राम के कोहबर में ले जाइल जाये के उल्लेख कइले बाने: "तब सखी मंगल गान करत, मुनीस आयसु पाइ कै; दल दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै।"[6]

शब्द के उल्लेख, केशव प्रसाद मिश्र के हिंदी उपन्यास कोहबर के शर्त के शीर्षके में बा जेकरे कहानी पर बाद में नदिया के पार फिलिम बनल।

सन्दर्भ[संपादन]

  1. 1.0 1.1 विद्यानिवास मिश्र (2009). हिंदी की शब्द-सम्पदा. राजकमल प्रकाशन प्रा॰ लि॰. पप. 124–. ISBN 978-81-267-1593-0.
  2. अम्बाप्रसाद सुमन (1971). मानसशब्दार्थतत्व. विज्ञानभारती.
  3. Ram Dayal Rakesh (2005). Janakpur: the sacred jewel of Nepal. Safari Nepal. ISBN 978-99933-59-96-8.
  4. सूर्यप्रसाद दीक्षित (2016). अवध संस्कृति विश्वकोश-1. वाणी प्रकाशन. पप. 218–. ISBN 978-93-5229-573-9.
  5. Jyotindra Jain (1997). Ganga Devi: tradition and expression in Mithila painting. Mapin Pub. पप. 50-. ISBN 978-0-944142-33-2.
  6. 6.0 6.1 नीतू शर्मा (2016). फ़ैजाबाद सांस्कृतिक गैजेटियर. वाणी प्रकाशन. पप. 119–. ISBN 978-93-5229-571-5.
  7. 7.0 7.1 गजेन्द्र ठाकुर (संप.). विदेह समालोचना. गजेन्द्र ठाकुर. पप. 103–. GGKEY:K809SH5BCW4.