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ऑथॉरिटेरियनिज़्म

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(ऑथॉरिटेरियनिज्म से अनुप्रेषित)


ऑथॉरिटेरियनिज़्म (अंग्रेजी: authoritarianism, हिंदी: सत्तावाद) एगो राजनीतिक सिस्टम हवे। एह सिस्टम में राजनीतिक बहुलता के नकार दिहल जाला। मतलब, अलग-अलग बिचार, पार्टी आ समूह के आज़ादी सीमित क दिहल जाले। सरकार मजबूत केंद्रीय ताकत के इस्तेमाल करके मौजूदा राजनीतिक हालात के जस के तस बनाए रखेले। एह प्रक्रिया में लोकतंत्र कमजोर हो जाला। सत्ता के बँटवारा, नागरिक आज़ादी आ कानून के राज भी घट जाला।[1][2]

ऑथोरिटेरियन शासन कई तरह के हो सकेला। कहीं ई ऑटोक्रेटिक हो सकेला, जहाँ सगरी ताकत एक्के आदमी के हाथ में होखे। कहीं ई ओलिगार्किक हो सकेला, जहाँ कुछ गिनल-चुनल लोग सत्ता संभारे लें। कई जगह ई सिस्टम कवनो एक पार्टी के राज पर टिकल होखे ला। कहीं फौज के दबदबा होखे ला, आ कहीं पूरा पावर बस एक्के ब्यक्ति में सिमट जाला।[3][4] कुछ देश अइसन भी बाड़ें जहाँ लोकतंत्र आ ऑथोरिटेरियनिज़्म के बीच के रेखा साफ ना दिखे। अइसन देशन के अक्सर “हाइब्रिड डेमोक्रेसी”, “हाइब्रिड रिजीम” या “कम्पटीटिव ऑथोरिटेरियन” कहल जाला।[5][6][7]

राजनीतिक वैज्ञानिक जुआन लिंज़ 1964 में लिखल अपना मशहूर काम[8] An Authoritarian Regime: Spain में ऑथोरिटेरियनिज़्म के चार खास लक्षण बतवले रहलें।

  1. पहिला लक्षण बा सीमित राजनीतिक बहुलता। ई संसद, राजनीतिक पार्टी आ अलग-अलग हित समूह पर लगावल गइल पाबंदियन से हासिल कइल जाला।
  2. दूसरा लक्षण बा राजनीतिक वैधता, जवन भावना के सहारे बनावल जाला। शासन खुद के “जरूरी बुराई” बतावे ला, जइसे कि पिछड़ापन, विद्रोह या समाज के कुछ साफ-साफ दिखे वाला समस्या से लड़े खातिर।
  3. तीसरा लक्षण बा राजनीतिक सक्रियता के बहुत कम होखल। सरकार विरोधी गतिविधियन के दबा दिहल जाला।
  4. चउथा लक्षण बा एग्ज़ीक्यूटिव पावर के साफ-साफ तय ना होखल। ई पावर अकसर धुंधला आ बदलत रहे ला, आ एहसे एग्ज़ीक्यूटिव के ताकत अउरी बढ़ावल जाला।

अगर कम से कम परिभाषा में देखल जाय, त ऑथोरिटेरियन सरकार में संसद खातिर आज़ाद आ मुकाबले वाला सीधा चुनाव ना होला। एग्ज़ीक्यूटिव खातिर भी आज़ाद आ प्रतिस्पर्धी सीधा या परोक्ष चुनाव ना होला, या फिर दुनो में से कवनो एक ना होला। अगर व्यापक रूप से देखल जाय, त ऑथोरिटेरियन राज्य अइसन देशन के भी शामिल करे लें जहाँ इंसानी हक, जइसे धर्म के आज़ादी, मौजूद ना होखे। या फिर अइसन देश जहाँ आजाद चुनाव के बादो सत्ता सरकार आ विपक्ष के बीच कम से कम एकहू बेर बदलाव ना होखे।

कई ऑथोरिटेरियन राज्यन में नांव भर के लोकतांत्रिक संस्थान भी मिल जालें। जइसे राजनीतिक पार्टी, संसद आ चुनाव। बाकिर ई सब सिस्टम असल में ऑथोरिटेरियन राज के मजबूत करे खातिर चलावल जाला। अइसन चुनाव अक्सर धांधली वाला आ बिना असली मुकाबला के होखे लें। 1946 के बाद, अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक सिस्टम में ऑथोरिटेरियन राज्यन के हिस्सा 1970 के दशक के बीच तक बढ़त रहल। ओकर बाद साल 2000 तक ई हिस्सा घटे लागल। साल 2000 से पहिले, तानाशाही सरकार ज़्यादातर तख्तापलट से बनत रहल। अक्सर ई पहिले से मौजूद ऑथोरिटेरियन शासन के जगह लेत रहल। साल 2000 के बाद, तानाशाही ज़्यादातर डेमोक्रेटिक बैकस्लाइडिंग के ज़रिए शुरू होखे लागल। मतलब, जनता से चुना गइल नेता धीरे-धीरे लोकतंत्र कमजोर करके ऑथोरिटेरियन शासन कायम क देला।

  1. Kalu, Kalu N. (2019). A Functional Theory of Government, Law, and Institutions. Rowman & Littlefield. pp. 161–. ISBN 978-1-4985-8703-7. OCLC 1105988740.
  2. Cerutti, Furio (2017). Conceptualizing Politics: An Introduction to Political Philosophy. Routledge. p. 17. राजनीति के जानकार लोग ऑथोरिटेरियनिज़्म के कई तरह के टाइप बनवले बाड़ें। एह सभ टाइपोलॉजी से एक ठो सबके मान्य परिभाषा निकालल आसान ना बा। तइयो, एह सिस्टम के कुछ बुनियादी खासियत साफ देखे के मिल जालीं। सबसे पहिलका बात ई बा कि एहमें राजनीति के भीतर टकराव आ अलग-अलग विचार के सामान्य चीज मानल ही ना जाला। मतभेद आ बहुलता के गलत समझल जाला। दूसरा बात ई बा कि मौजूदा हालात, मतलब स्टेटस क्वो, के जस के तस बनाए रखे के पक्का चाह होखे ला। बदलाव आवे ना पाए, एह खातिर मजबूत केंद्रीय सत्ता सगरी राजनीतिक गतिविधियन के कड़ा निगरानी में रखेले। आ आखिरी बात ई बा कि एह तरह के शासन में कानून के राज धीरे-धीरे कमजोर हो जाला। सत्ता के बँटवारा खत्म होखे लागे ला। लोकतांत्रिक वोटिंग प्रक्रिया भी कमजोर पड़ जाले, आ कई बेर त बस नाम भर के रह जाले।
  3. Ezrow, Natasha M.; Frantz, Erica (2011). Dictators and Dictatorships: Understanding Authoritarian Regimes and Their Leaders. Continuum International Publishing Group. p. 17.
  4. Lai, Brian; Slater, Dan (2006). "Institutions of the Offensive: Domestic Sources of Dispute Initiation in Authoritarian Regimes, 1950–1992". American Journal of Political Science. 50 (1): 113–126. doi:10.1111/j.1540-5907.2006.00173.x. JSTOR 3694260.
  5. Levitsky, Steven; Way, Lucan A. (2010). Competitive Authoritarianism: Hybrid Regimes after the Cold War. Problems of International Politics. Cambridge: Cambridge University Press. doi:10.1017/cbo9780511781353. ISBN 978-0-521-88252-1. Archived from the original on 18 October 2022. Retrieved 2 September 2022.
  6. Diamond, Larry (2002). "Elections Without Democracy: Thinking About Hybrid Regimes". Journal of Democracy. 13 (2): 21–35. doi:10.1353/jod.2002.0025. ISSN 1086-3214. S2CID 154815836. Archived from the original on 7 October 2022. Retrieved 2 September 2022.
  7. Gunitsky, Seva (2015). "Lost in the Gray Zone: Competing Measures of Democracy in the Former Soviet Republics". Ranking the World: Grading States as a Tool of Global Governance (अंग्रेजी में). Cambridge University Press: 112–150. doi:10.1017/CBO9781316161555.006. ISBN 978-1-107-09813-8. SSRN 2506195.
  8. Richard Shorten, Modernism and Totalitarianism: Rethinking the Intellectual Sources of Nazism and Stalinism, 1945 to the Present Archived 2020-01-09 at the Wayback Machine (Palgrave Macmillan, 2012), p. 256 (note 67): "For a long time the authoritative definition of authoritarianism was that of Juan J. Linz."