Jump to content

ऋतुचर्या

विकिपीडिया से

ऋतुचर्या आयुर्वेद के एगो मूल सिद्धांत हवे। एह सिद्धांत के अनुसार, ऋतु (सीजन) बदले के साथे-साथ आहार, विहार आ दैनिक दिनचर्या में बदलाव कइल जरूरी होला, ताकि त्रिदोष—वात, पित्त आ कफ—संतुलित रहलें आ मौसमी रोगन से बचाव हो सके।

आयुर्वेद में साल के दू भाग में बाँटल गइल बा—आदान काल (उत्तरायण) आ विसर्ग काल (दक्षिणायन)। आदान काल में शिशिर, वसंत आ ग्रीष्म ऋतु आवेली, जबकि विसर्ग काल में वर्षा, शरद आ हेमंत ऋतु शामिल बाड़ी। चरक संहिता में बतावल गइल बा कि वसंत ऋतु में जाड़ा के दौरान जमा भइल कफ, सूर्य के किरण से द्रवीभूत होके कुपित हो जाला।[1] एहसे श्वसन तंत्र से जुड़ल रोग होखे के संभावना बढ़ जाला। एही तरह सुश्रुत संहिता में ऋतु के अनुसार आहार-विहार के पालन के स्वास्थ्य संरक्षण के आधार मानल गइल बा। उदाहरण खातिर, ग्रीष्म ऋतु में शीतल, तरल आ सुपाच्य भोजन खाए के सलाह दिहल गइल बा। वर्षा ऋतु में हल्का आ सादा भोजन उपयुक्त मानल गइल बा। शरद ऋतु में मधुर आ तिक्त रस प्रधान आहार के सेवन करे के सुझाव दिहल गइल बा।[2]

एह प्रकार आयुर्वेद ई कहे ला, ऋतुचर्या के पालन खाली रोग से बचावे में मदद ना करेला, बल्कि शरीर के प्रकृति में होखे वाला बदलाव के अनुसार ढाल के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के रक्षा भी करेला। ऋतुचर्या के हिसाब से कइल माइनर बदलाव सालभर सरीर के एनर्जेटिक रखे ला।[3]

अष्टांगह्रदय में

[संपादन करीं]

अष्टांगह्रदय के ऋतुचर्याध्याय में आचार्य वाग्भट ऋतु के हिसाब से छहो रस (मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त आ कषाय) के सेवन के नियम बतवले बाड़ें:[4]

शीते वर्षासु चाद्यान् त्रीन् वसन्ते त्वन्यान् रसान् भजेत् ।
स्वादुं निदाघे, शरदि स्वादुतिक्तकषायकान् ॥ ५५ ॥
शरद्वसन्तयो रूक्षं शीतं घर्मघनान्तयोः ॥ ५६ ॥
अल्पपानं समासेन विपरीतमतोऽन्यथा ।
नित्यं सर्वरसाभ्यासः स्वास्थ्यवृत्तमुदाहृतम् ॥ ५७ ॥

एह श्लोक के अनुसार शीत ऋतु आ वर्षा ऋतु में पहिले तीन रस—मधुर, अम्ल आ लवण—के सेवन हितकारी मानल गइल बा, जबकि वसन्त ऋतु में बाकी तीन रस—कटु, तिक्त आ कषाय—के अधिक सेवन करे के सलाह दिहल गइल बा। निदाघ (ग्रीष्म) ऋतु में मुख्य रूप से मधुर रस के सेवन उचित बतावल गइल बा, जबकि शरद ऋतु में मधुर, तिक्त आ कषाय रस के प्रधानता देवे के निर्देश बा। एही तरह शरद आ वसन्त ऋतु में कुछ रूक्ष (सूखल प्रकृति वाला) आहार, जबकि ग्रीष्म आ वर्षा के अन्तिम समय में शीतल पदार्थ लाभदायक मानल गइल बा। पेय पदार्थन के सेवनो ऋतु के अनुरूप आ उचित मात्रा में करे के चाहीं।

आचार्य वाग्भट अंत में ई स्पष्ट करेलें कि यद्यपि अलग-अलग ऋतु में कुछ रस विशेष रूप से अधिक हितकारी होलें, फिरो स्वास्थ्य बनवले राखे खातिर छहो रस के संतुलित आ नियमित सेवन जरूरी बा। एही के स्वस्थ जीवनचर्या अर्थात् स्वास्थ्यवृत्त के मूल सिद्धान्त कहल गइल बा।

इहो देखल जाय

[संपादन करीं]
  1. चरक संहिता, सूत्रस्थान, अध्याय 6 (ऋतुचर्या वर्णन)
  2. सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान, अध्याय 6
  3. Gerson, Scott (13 फरवरी 2002). The Ayurvedic Guide to Diet & Weight Loss: The Sattva Program (अंग्रेजी में). Lotus Press. pp. 287-. ISBN 978-0-910261-29-6. Retrieved 2 जून 2026.
  4. बालकृष्ण, आचार्य (1 अक्टूबर 2017). Ashtang Hridyam (Sanskrit में). Divya Prakashan. ISBN 978-93-47356-35-3. Retrieved 2 जून 2026.