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अति-उपभोग

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अति-उपभोग (अंग्रेजी: overconsumption) ओह स्थिति के कहल जाला, जहाँ उपभोक्ता लोग अपन उपलब्ध सामान–सेवा के अतना इस्तेमाल कर लेला कि ओकरा के ना त दुबारा भरना जा सके, ना फेर से इस्तेमाल करे में रुचि रखेला। माइक्रोअर्थशास्त्र (microeconomics) में, ई ओह बिंदु पर होखेला, जहाँ उपभोक्ता के मार्जिनल लागत ओकरा मार्जिनल उपयोगिता से बेसी बढ़ जाला। “ओभरकंजंपशन” शब्द बहुते विवादित बा आ ई हमेशा एके तरह परिभाषित ना होखेला। जब ई शब्द प्राकृतिक संसाधन खातिर इस्तेमाल होखेला, आ ओह स्तर तक पहुँचल होखे जहाँ पर्यावरण पर नकारात्मक असर पड़े, त एकरा के अति-दोहन (overexploitation) के बराबर मानल जाला। बाकिर बड़हन आर्थिक अर्थ में, अति-उपभोग कवनो सामान–सेवा (कृत्रिम सहित) के जरूरत से जादे इस्तेमाल खातिर इस्तेमाल हो सकेला—जइसे, “शराब के जरूरत से जादे सेवन से alcohol poisoning हो सकेला।”

अतिउपभोग (ओवरकंजम्पशन) के बढ़ावा देवे में मौजूदा वैश्विक अर्थव्यवस्था के कई कारक जिम्मेदार बाड़ें। एहमें उपभोक्तावाद (कंज्यूमरिज्म), योजनाबद्ध अप्रचलन (प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस), आर्थिक भौतिकवाद आ दूसर अइसन कारोबारी मॉडल सभ शामिल बाड़ें, जे लंबा समय में टिकाऊ ना मानल जालें। अतिउपभोग के तुलना संधारणीय उपभोग (सस्टेनेबल कंजम्पशन) से कइल जाला, जवन संसाधनन के जिम्मेदारी से आ संतुलित ढंग से इस्तेमाल करे पर जोर देला।

कवनो नेचुरल संसाधन के कतना मात्रा में इस्तेमाल होखे पर ओकरा के ओवरकंजम्पशन कहल जाई, एहके तय कइल आसान नइखे। काहे कि कवनो व्यवस्था के सस्टेनेबल कैपेसिटी निश्चित करे खातिर बहुत तरह के कारकन के ध्यान में रखे के पड़े ला। कवनो बेवस्था के कुल छमता लोकल आ बैस्विक दुनो लेवल पर मौजूद हो सकेला। एहसे कुछ इलाकन में संसाधन के उपलब्धता बेसी होखे के कारण ओहिजा कुछ खास संसाधन के खपत दुसरे इलाकन से बसियो हो सकेला, बाकिर एकरा चलते ई जरूरी नइखे कि अतिउपभोग होखे।

हालाँकि, कवनो क्षेत्र भा पारिस्थितिक व्यवस्था में लंबा समय तक चलत अतिउपभोग के प्रवृत्ति नेचुरल संसाधनन में कमी पैदा कर सकेला, जेकर परिणाम अक्सर पर्यावरणीय गिरावट के रूप में सामने आवेला। ई बात खास तौर पर तब लागू होले जब अतिउपभोग के पर्यावरणीय प्रभाव के संदर्भ में देखल जाव।

अर्थशास्त्र में एह शब्द के मतलब कुछ अलग होला। आर्थिक दृष्टिकोण से अतिउपभोग ओह बिंदु पर मानल जाला, जब कवनो उपभोक्ता खातिर कवनो चीज के अतिरिक्त खपत के सीमांत लागत (मार्जिनल कॉस्ट) आ सीमांत उपयोगिता (मार्जिनल यूटिलिटी) बराबर हो जाव। गॉसेन के घटत उपयोगिता के नियम (Gossen's Law of Diminishing Utility) के अनुसार एह अवस्था पर उपभोक्ता एह बात के महसूस करे लागेला कि कवनो अउरी वस्तु खरीदे भा इस्तेमाल करे से मिले वाला संतोष भा फायदा, ओकर लागत के मुकाबला में पर्याप्त नइखे। एह कारण अतिरिक्त खपत उपभोक्ता के भलाई भा संतुष्टि में कवनो खास बढ़ोतरी नइखे करत।

बाहरी कड़ी

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